
भावना पंवार
मीना और रीना दोनों जेठानी और देवरानी हैं। दोनों की शादी के बीच दो तीन साल का ही अंतर है। दोनों की इसलिए अच्छी भी बनती है और दोनों के बीच बहनों से बढक़र प्रेम है। दोनों ही एक दूसरे पर जान लुटाती हैं। इनकी सास इसी बात का घमंड भी करती है। आज के जमाने में मेरा भी संयुक्त हंसता हुआ परिवार है। मीना का पति गौरव कम पढ़ा लिखा है। वो फैक्ट्री में काम करता है, अनुभव की वजह से उसके मासिक वेतन में हमेशा बढ़ोतरी होती रहती है, वहीं रीना का पति सुरेश एक छोटी सी फैक्ट्री में काम करता है, वेतन भी कम है किंतु वो कभी अधिक की चाह रखता ही नहीं है और वो उसी में संतुष्ट रहता है। कई बार गौरव ने कहा भी सुरेश को कि भाई तू मेरी फैक्ट्री में चल, मेरे अनुभव पर मेरी पगार बढ़ा दी गई तुम्हारी भी वक्त रहते बढ़ जाएगी, सुरेश उस बात को टाल देता और वो अपनी उसी फैक्ट्री में जाता।
धीरे-धीरे वक्त गुजरने लगा, मीना और रीना के बच्चे भी बढ़े होने लगे, मीना के बच्चे बड़ी स्कूल में जाते वहीं रीना के बच्चे छोटी स्कूल में। मीना कभी कभी कह भी देती, तुम्हारे बच्चों की शरारत की वजह से मेरे बच्चे पढ़ नहीं पाते। तुम अपने बच्चों को कमरे में ही रखा करो।
वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है। सासू मां का देहांत हो गया। दोनों भाई साथ रह रहे थे। पर मीना को अपने पति के कमाए पैसों का घमंड होने लगा, वो अब घर में पैसे देने पर ताने कसने लगी, हर छोटी बात पर रीना को सुनाने लगी। मोहल्ले में भी कहने लगी मेरा पति घर चलाता है, रीना के पति से घर क्या ही चलेगा।
मीना देखते ही देखते पूरी तरह से बदल गई। पैसों की आड़ में वो धीरे धीरे सब कुछ भूलती जा रही थी। सासू मां के घर को वो बराबर हिस्से में बांटने लगी और फिर रीना और उसके पति को घर से अलग कर दिया। उसने अपना एक आलीशान घर भी बनवा लिया। अपने बच्चों को विदेश पढऩे भेज दिया। वहीं रीना एक छोटे से घर में रहने लग गई। उसका पति उसी फैक्ट्री में जा रहा था। रीना ने भी दिन दुगनी रात चौगुनी कर पैसा कमाना शुरू किया। जितने भी पैसे वो दोनों मिल कर कमाते उन पैसों से वो अपने बच्चों को पढ़ाते, उसके बच्चों में बहुत अच्छी समझ थी। वे अक्सर किसी बात की जिद्द नहीं करते अथवा संस्कारों से पूर्ण रूप से भरे उसके बच्चे बहुत साधारण जीवन जीते थे।
धीरे धीरे बात बढऩे लगी, एक दिन मीना ने अपनी काम वाली बाई को बोला, तुम ये सब मिठाई और खिलौने ले जाया करो, कुछ कमी हो तो मुझे बताया करो, तुम्हारे सिवा यहां मेरा है ही कौन? गौरव सुबह दस बजे से रात दस बजे तक फैक्ट्री में रहता है, एक तुम ही तो हो, वरना इस आलीशान घर में मेरा रहने का भी मन न हो। मीना अपने पति गौरव को हमेशा कहती, मैं पूरे दिन घर में अकेली रहती हूं, मेरा मन ही नहीं लगता।
गौरव ने कहा, अब जब गलती तुमने की है तो तुम ही पश्चाताप करो।
संयुक्त परिवार मात्र साथ रहने के लिए नहीं बल्कि सुख, दु:ख बांटने के लिए भी होता है। एक की जरूरत पडऩे पर हमें दो लोग मिल जाते हैं।
काम वाली बाई अगले दिन सुबह आई और मीना से कहने लगी, आपने सुना मालकिन पास में जो आपकी देवरानी रहती हैं उसके बेटे ने आज टॉप किया है, दोनों बेटे बेटी उनके पढऩे में होशियार हैं। संस्कारों से भरे बेहद अच्छे हंै। मीना को ये सुन खुशी हुई पर वो अब जताए भी तो कैसे।
मीना ने अपने लडक़े को फोन किया तो उसने कहा, मैं शादी कर रहा हूं, अगले महीने। मीना ने कहा, घर आकर बात करना बेटा। उसका बेटा बोला, नहीं मां, मैं पूछ नहीं रहा बता रहा हूं, आप पिताजी को बता देना, मैं अब भारत नहीं आऊंगा, यहीं रहूंगा। मीना की आंखों में आंसू आ गए। उसने अपनी बेटी को फोन किया तो वो कहने लगी, मां खाना खा लिया। एक ही बात हर बार पूछती हो, फोन रखो। मीना रोए जा रही थी।
मीना ने गौरव को कहा, बच्चों को विदेश भेजा था पढऩे के लिए परंतु वे वहीं के हो गए। गौरव बोला, मैंने कहा था भारत में ही पढ़ाने ले लिए, तुम्हें ही अपने बच्चों को बाहर भेजना था। मीना को अपनी गलतियों पर दु:ख हो रहा था। वहीं उसकी देवरानी के बच्चों ने हमेशा कम संसाधनों में रहकर अपने माता पिता का नाम भी ऊंचा किया और संस्कार भी पा लिए।
मीना उस दिन रीना के पास गई और माफी मांगने लगी।
धीरे-धीरे दोनों वापस संयुक्त परिवार में रहने लगे। रीना के बच्चों के साथ घुल कर मीना भी खुश हो गई और एक दो साल बाद संयुक्त परिवार के प्रेम ने मीना के बच्चों को विदेश से वापस आने के लिए प्रेरित कर दिया।
आज वे सभी एक साथ बहुत खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। संयुक्त परिवार, दु:ख, सुख, झगड़े, अपनेपन सभी का संयोग है। जीवन की कठिनाइयों में हम कभी भी खुद को अकेला नहीं पाएंगे।
Updated on:
18 May 2024 05:56 pm
Published on:
18 May 2024 05:50 pm
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