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सूनी गोद भरने के लिए दूर दूर से लोढ़ी माता के दरबार में आते हैं लोग

संतान की इच्छा खींच लाती है लोढ़ीमात के दरबार में, सच्चे मन से पूजा करने पर भर देती है गोद

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शिवपुरी. देशभर से भक्त दरबार सूनी गोद भरने के लिए राजा नल की नगरी नरवर में पहुंचते हैं। शिवपुरी जिले के नरवर में लोढ़ीमाता की मंदिर स्थित है। पूरी साल यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। कोरोना काल में भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कम नहीं हुई। कहा जाता है एक बार जिसने माता को याद किया उसे यह अपने पास बुला ही लेती है।

माता के भक्तों में सबसे बड़ी संख्या निसंतान दंपतियों की होती है। मान्यता है कि जो लोग दवा कराकर थक चुके होते है और जब कोई उपाय नहीं होता तब लोढ़ीमाता उनके लिये उम्मीद बन जाती है। माता के दर से आज तक कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। जो भी मन्नत लेकर यहां आया वह पूरी जरूरी होती है। मनौती के लिये मंदिर के पीछे गोबर से हाथे लगाए जाते हैं और जब मनौती पूरी हो जाती है तो फिर भक्त माता का आभार जताने नरवर आते हैं और अठवाई का प्रसाद चढ़ाकर माता की पूजा करते हैं।

शिवपुरी जिले के इस प्राचीन नगर नरवर का ऐतिहासिक महत्व भी है। लोढ़ीमाता के मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा है जो नरवर के राजा राजा नल से जुड़ी है। इस कहानी की पुष्टि एक पुरातत्व अभिलेख से भी होती है कि लोढ़ी माता पूर्व में नटनी थी, जो कई जादुई शक्तियों की मालिक थी। एक बार राजा और नटनी के बीच शर्त लगी कि पहाड़ पर बने राजा के किले तक अगर कच्चे दागे पर नाचकर पहुंच गई तो राजा क्या देंगे। राजा नल ने बिना सोचे समझे कह दिया कि अगर एसा हुआ तो वह अपना सारा राजपाट उसे दे देंगे।

बताया जाता है कि नटनी ने अपनी जादुई शक्ति से राज्य के सभी हथियारों की धार को बांध दिया यानि कि किसी भी हथियार से कच्चे धागे को काटा नहीं जा सकता था। फिर शुरु हुआ नृत्य और कच्चे धागे पर नाचते हुए किले की तरफ जा रही नटनी ने आधा रास्ता पार कर लिया। जब राजा नल ने देखा तो अपनी गलती की अहसास हुआ और नटनी को रोकने के लिये मंत्रियो से सुझाव मांगे। बाद में पूरे नगर में केवल रांपी पर धार मिली, रांपी जिससे जूते सिले जाते हैं राजा ने किले से बंधे उस धागे को रांपी को काट दिया और नटनी वहीं गिर गई। तब राजा नल ने घोषणा की आने वाली पीड़ियां इस देवी को लोढ़ी माता के नाम से जानेंगी।

कोरोना काल में भी भक्तों का डेरा
कोरोना के चलते लोड़ी माता ट्रस्ट कमेटी ने मंदिर को बंद कर दिया था, लेकिन श्रद्धालुओं का नरवर आना बंद नहीं हुआ मंदिर बंद होने के बाद भी लोग बाहर से पूजा करते रहे। हर दिन हजारों की संख्या में मंदिर के बाहर पहुंचे भक्तों ने बाहर से ही पूजा कर लौट जाते।