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1989 – लोकसभा में पिछड़ों के लिए सीटों का आरक्षण वर्ष 2000 तक बढ़ा

आधिकारिक तौर पर इसे ‘द कांस्टीट्यूशन (62 एमंडमेंट) एक्ट’, 1989 के रूप में भी जाना जाता है

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जयपुर

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Sunil Sharma

Aug 13, 2017

1989 - indian parliament

1989 - indian parliament

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एवं एंगलो इंडियंस की सीटों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाते हुए वर्ष 1989 में इसे दस साल तक यानि 26 जनवरी, 2000 तक कर दिया गया। यह प्रतिनिधित्व संविधान में ६२वें संशोधन के तहत किया गया। आधिकारिक तौर पर इसे ‘द कांस्टीट्यूशन (62 एमंडमेंट) एक्ट’, 1989 के रूप में भी जाना जाता है।

संविधान की धारा 334 के तहत सीटों का आरक्षण 1960 तक ही रखा जाना था। लेकिन, 8वें संधोधन के तहत इसे बढ़ाकर १९७० तक कर दिया गया था। सीटों का आरक्षण का समय १९८० और १९९० तक क्रमश: २३वें और ४५वें संशोधन के जरिए बढ़ा दिया गया। ६२वें संशोधन के तहत आरक्षण का समय वर्ष २००० तक बढ़ा दिया गया। सीटों का आरक्षण का समय २०१० और २०२० तक क्रमश: ७९वें और ९५वें संशोधन के जरिए बढ़ाया गया।

यूनियन कार्बाइड कंपनी क्षतिपूर्ति के रूप में दिए 470 मिलियन डॉलर
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में वर्ष 1984 में हुई गैस त्रास्दी को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भी कहा जाता है। यह दुर्घटना २-३ दिसंबर, 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के कीटनाशक प्लांट में हुआ। प्लांट से निकली मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) और अन्य गैसों के रिसाव से 5 लाख लोग प्रभावित हुए।

गैसों के निकलने से प्लांट के आस-पास रह रहे लोग प्रभावित हुए थे। गैस रिसाव से कितनी मौतें हुई, इसे लेकर विभिन्न अनुमान अलग-अलग हैं। रिसाव के बाद जारी सरकारी आंकड़ों में कहा गया था कि २२५९ लोग मारे गए हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने त्रास्दी में ३७८७ लोगों के मारे जाने की पुष्टि की। २००६ में दिए गए सरकारी शपथपत्र में कहा गया कि गैस रिसाव के कारण ५५८, १२५ लोग घायल हुए।

इनमें से ३९०० लोग गंभीर रूप से और स्थायी रूप से घायल हुए। अन्य अनुमानों के तहत गैस रिसाव के दो हफ्तों के अंदर ८ हजार लोगों की मौत हो गई थी और अन्य ८ हजार या अधिक गैस से संबंधित बीमारियां के कारण मारे गए। गैस रिसाव का कारण क्या था, यह बात अभी तक साफ नहीं हो पाई है। फैक्ट्री का मालिकाना हक यूसीआईएल के पास था जिसके अधिकतर शेयर यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (यूसीसी) के पास थे। दुर्घटना के पांच साल बाद यूसीसी ने १९८९ में घटना के लिए भारत सरकार को क्षतिपूर्ति के रूप में ४७० मिलियन डॉलर (२०१४ में ९०७ मिलियन डॉलर) अदा किए।


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