यह बात आचार्य चंद्रयश सूरीश्वर ने होसकोटे हाईवे मार्ग पर स्थित नवनिर्मित जय जीरावला तीर्थ के अंजनश्लाका प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के तीसरे दिन शनिवार को प्रभु पार्श्व के जन्म बधाई, परमात्मा के नामकरण, लग्न उत्सव और राज्याभिषेक उत्सव में कही। आचार्य ने कहा कि परमात्म संसार में रहते थे लेकिन उनका मन सदा वैराग्य में ही रहता था। हम संसार का त्याग नहीं कर सकते लेकिन जीवन के अंदर संसार का राग तो छोड़ सकते हैं। परिवार और संपत्ति पर हम आधिपत्य ऐसे मानते हैं, जैसे कि हमको यह सब छोड़कर जाना ही नहीं है।आचार्य ने कहा कि प्रभु के जीवन से हमें सीख लेनी है कि संसार में रहें मगर वैराग्य भाव से रहें। कोई भी चीज पर राग नहीं करना है। हमें अनमोल मानव जीवन मिला है, उसका सदुपयोग करना सीखना चाहिए।नाशवंत पदार्थों के पीछे जीवन को व्यर्थ नहीं करना चाहिए। प्रभु का कल्याणक उत्सव जगत के जीवों के लिए कल्याण करने वाला होता है। यह विधि-विधान सब हमको परमात्मा की जीवन से रूबरू कराता है।साक्षात परमात्मा का देखने का पुण्य अवसर तो हमें नहीं मिला लेकिन यह कल्याणक उत्सव में परमात्मा के जीवन के बारे में जानकर हमें हमारी आत्मा को भावित करना है। आचार्य ने कहा कि रविवार को परमात्मा का दीक्षा कल्याणक का वरघोड़ा होगा। दीक्षा कल्याणक की उजवणी होगी और रात्रि में अंजनश्लाका का विधान होगा।
इससे पहले संघवी वसंतीबाई भूरमल तुलेच्छावोरा रिलिजियस एंड चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से अंजनश्लाका व प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में जन्म बधाई दी गई। परमात्मा का नामकरण, लग्न उत्सव और राज्य अभिषेक के साथ प्रभु से विनती हुई। आचार्य ने कहा कि वाराणसी नगरी में परमात्म पार्श्वनाथ प्रभु के जन्म का समाचार राजा अश्वसेन को प्रियंवदा दासी ने हर्षोल्लास के साथ दी। पुत्र जन्म के समाचार सुनकर राजा अश्वसेन ने पूरे राज्य में उत्सव मनाया और वाराणसी नगरी में आनंद का वातावरण बना। जन्मोत्सव के बाद परमात्मा का नामकरण हुआ। फिर प्रभु का पाठशाला गमन, लग्नोत्सव, राज्याभिषेक हुआ। परमात्मा ने भोगावली कर्म परिपूर्ण होने पर दीक्षा लेने हेतु विनती की थी।