
पिशात मोचन कुण्ड़ वाराणसी
मोक्ष नगरी काशी में पित्रों के तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है। जिसके चलते काशी में सारी तैयारीयां लगभग पूरी हो चुकी है। पितृ पक्ष के मौके पर बनारस के घाटों समेत पिशाच मोचन कुण्ड़ पर विशेष भीड़ रहती है। हजारों की संख्या में लोग यहां पहुंच कर पितृों का तर्पण करते है। पिशाच मोचन कुण्ड़ के बारे में मान्यता है कि यह कुण्ड़ मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने से पहले का है। जिसका दूसरा नाम विमल कुंड है।
पितृ कार्य अति अनिवार्य कार्य है
पिशात मोचन कुण्ड़ के पुजारी पं. विश्वनाथ ने पत्रिका को बताया कि सांसारिक परिवर्तन में देव+पितृ की अहम भूमिका है। जिसमें पितृ कार्य अर्थात श्राद्ध अति अनिवार्य कार्य है और देव कार्य अनिवार्य। वह कहते है कि देव कार्य तो कोई भी कर सकता है लेकिन पितृ का कार्य केवल पुत्र ही कर सकता है। श्राद्ध पुत्र का नित्यकर्म है।
कर्म को दो भागों में बांटा गया है
01 नित्यकर्म
02 नैमित्त कर्म
नित्यकर्म में विचार का कोई समावेश नहीं है जैसे भोजन, शयन, मल-मूत्र त्यागना, स्नान करना आदि करना उसी प्रकार पित्र तर्पण के लिए भी विचार नहीं करना चाहिए वह अति महत्वपूर्ण कार्य है।
नैमित्त कार्य में देवी देवताओं की पूजा करना इत्यादि शामिल है जिसके लिए विचार विमर्श किया जाता है लेकिन श्रद्ध अतिअनिवार्य कार्य है जो हर पुत्र को बिना सोचे करना चाहिए। पं विश्वनाथ पिता को देव से श्रेष्ण बताते है और कहते है कि मास में दो पक्ष होते है। पहला कृष्ण पक्ष दूसरा शुक्ल पक्ष। कृष्ण पक्ष पितृ कार्य के लिए है और शुक्ल पक्ष देव कार्य के लिए। पिता। पितृ खत्म होते ही नव दुर्गा की पूजा शुरु हो जाती है।
पितृ कार्य का सम्पादन पुत्र को ही करना चाहिए। यदि पुत्र न होतो अत्यंत निकटतम सम्बधियों द्वारा किया किया जा सकता है। लेकिन इस कार्य में प्रतिनिधि का समावेश नहीं है। देव कार्य ब्राहम्ण, विद्वान या किसी अन्य द्वारा भी किया जा सकता है। लोकिन पितृ का श्राद्ध पुत्र ही करता है। इससे सिद्ध होता है कि पितृ कर्म अनिवार्य कर्म है।
Published on:
05 Sept 2017 09:51 pm

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