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बिजली से वंचित वन क्षेत्र के लिए सौर ऊर्जा बनी संजीवनी, सैकड़ों किसान हो रहे आत्मनिर्भर

500 से अधिक किसानों को मिला निशुल्क सोलर संयंत्र, खेती में आई क्रांति, कोटड़ा से नारायण वड़ेरा की रिपोर्ट

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मसरू के ढलान भूमि पर मक्का की खेती

कोटड़ा (उदयपुर). जिले से लगभग 125 किलोमीटर दूर स्थित कोटड़ा उपखंड का फुलवारी की नाल क्षेत्र चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ एक आदिवासी बहुल इलाका है। जहां के अधिकांश राजस्व गांव उमरिया, लोहारी, बेड़ाधर, सूरा, आम्बा, झेर, चौकी, कड़वा महूड़ा और कुआं खंडी जो वन विभाग की अनुमति नहीं मिलने के कारण आज भी बिजली से वंचित है। ऐसे में प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत उद्यान विभाग की ओर से किसानों को उपलब्ध कराए गए सौर ऊर्जा संयंत्र अब इन ग्रामीण इलाकों के लिए वरदान साबित हो रहे है। योजना के तहत 500 से अधिक किसानों को बिना बिजली बिल के सोलर सिस्टम मिले है, जिनकी मदद से वे साल भर में तीन-तीन फसलें लेने लगे है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ है।

केस 1: शांतिलाल बुम्बरिया, डूंगरिया थला

शांतिलाल ने बताया कि उनका गांव फुलवारी की नाल अभयारण्य क्षेत्र में आता है, जहां बिजली के पोल लगाने की अनुमति वन विभाग से नहीं मिल पाई। ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता भैरूलाल पारगी की पहल पर उन्हें छह वर्ष पूर्व उद्यान विभाग से पांच हॉर्स पावर का सौर ऊर्जा संयंत्र निशुल्क मिला। अब वे चार से पांच बीघा भूमि में मक्का, गेहूं और मूंग की खेती कर रहे है। पहले वे डीजल इंजन से सिंचाई करते थे, जिस पर प्रतिदिन करीब 1000 रुपए का खर्च आता था। सोलर सिस्टम लगने के बाद पिछले छह वर्षों से सिंचाई पर कोई खर्च नहीं हुआ है।

केस 2: मसरू पारगी, डूंगरिया थला

मसरू ने बताया कि उनकी कृषि भूमि पहाड़ी क्षेत्र में है। पहले नहर की अनुपलब्धता के कारण केवल वर्षा आधारित खेती होती थी, जिसमें सिर्फ मक्का और उड़द बोई जाती थी। लेकिन सौर ऊर्जा संयंत्र लगने के बाद अब वे गेहूं, हरी सब्जियां और गर्मियों में भी मक्का जैसी फसलें उगा पा रहे है। इससे उनके परिवार की खाद्यान्न आवश्यकता भी पूरी हो रही है।

केस 3: मीठिया खैर, ठेप (खजुरिया पंचायत)

मीठिया ने बताया कि सोलर संयंत्र लगने के बाद उन्होंने पारंपरिक नहर सिंचाई के स्थान पर ड्रिप इरिगेशन प्रणाली अपनाई है, जिससे जल की बचत हो रही है। पहले उन्हें डीजल इंजन से सिंचाई करनी पड़ती थी और अनाज बेचकर डीजल खरीदना पड़ता था। अब वे साल भर में मक्का, सरसों, मूंगफली, कपास जैसी नकदी फसलें उगाकर 1.25 लाख से 1.5 लाख रुपए तक की आमदनी कर रहे है, जबकि पहले उनकी कमाई महज 20,000 से 30,000 तक ही सीमित थी।