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Navratri: इन मंत्रों से करें माता कूष्मांडा की पूजा, पूरी होगी हर मनोकामना, सूर्य का भी मिलता है आशीर्वाद

maa kushmanda mantra: नवरात्रि के चौथे दिन मां आदिशक्ति के चौथे रूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। यह स्वरूप सूर्य की अधिष्ठात्री और समस्त सिद्धि निधि की स्वामिनी हैं। इनको प्रसन्न करने के लिए जानें मां कूष्मांडा की आरती, मां कूष्मांडा कवच, मां कूष्मांडा की आरती, मां कूष्मांडा के मंत्र आदि...

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Pravin Pandey

Apr 11, 2024

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नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा इन मंत्रों से करनी चाहिए


धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवी सिद्धिदात्री का रूप धारण करने के बाद ब्रह्माण्ड को ऊर्जा प्रदान करने के लिए देवी पार्वती सूर्य मण्डल के मध्य निवास करने लगीं। इसके बाद से ही देवी को कूष्माण्डा के नाम से जाने जाना लगा। कूष्माण्डा वह देवी हैं, जिनमें सूर्य के अंदर निवास करने की शक्ति और क्षमता है। देवी माता की देह की कान्ति और तेज सूर्य के समान दैदीप्यमान है। नवरात्रि के चौथे दिन इन्हीं देवी कूष्माण्डा की पूजा-अर्चना की जाती है। इनका प्रिय पुष्प लाल फूल है।


देवी कूष्माण्डा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। ये सिंह की सवारी करती हैं, इनके दाहिने हाथ में कमंडल, धनुष, बाण और कमल तथा बाएं हाथ में क्रमशः अमृत कलश, जप माला, गदा, चक्र सुशोभित हैं। भक्तों की मान्यता है कि सिद्धियां और निधियां प्रदान करने की समस्त शक्ति देवी मां की जप माला में विद्यमान है।
मान्यता है कि देवी माता ने अपनी मधुर मुस्कान से सम्पूर्ण संसार की रचना की है, जिसे संस्कृत में ब्रह्माण्ड कहा जाता है। देवी मां को श्वेत कद्दू की बली अति प्रिय है, जिसे कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। ब्रह्माण्ड और कूष्माण्ड से संबंधित होने के कारण देवी का यह रूप देवी कूष्माण्डा के नाम से लोकप्रिय हैं। मान्यता है कि देवी कूष्माण्डा सूर्य ग्रह को दिशा और ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः भगवान सूर्य देवी कूष्माण्डा द्वारा शासित होते हैं।

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ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥


सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥


या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥


हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥

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कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥
पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। शाकम्बरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुँचाती हो माँ अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भण्डारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याये। भक्त तेरे दर शीश झुकाये॥