नगर निगम शहरवासियों को सड़क, बिजली, पानी सहित उपचार की सुविधा भी मुहैया कराता है, पर पिछले सात माह से निगम ने स्वास्थ्य सुविधा में कटौती कर दी है। गुड़ाखू लाइन स्थित आयुर्वेदिक अस्पताल को बंद कर दिया गया है। अस्पताल में ताला लटक रहा है। इसके चलते आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज कराने वाले मरीज भटक रहे हैं। वहीं यहां पदस्थ रहे डॉक्टर को किसी दूसरे अस्पताल में अटैच करने की बजाय बाबू बना दिया गया है। पद के अनुरूप उपचार संबंधी सेवाएं लेना छोड़कर कागजों में ही उलझाकर रख दिया गया है।
शहर सहित गांव से भी रोज आते थे मरीज
निगम ने यह कहकर औषधालय को बंद कर दिया है कि यहां मरीज नहीं आते थे, पर यहां कार्यरत रहे कर्मचारियों ने बताया कि औषधालय में आयुर्वेदिक दवाइयां बनाईं जाती थीं। इन दवाइयों की अच्छी डिमांड थी। शहर ही नहीं बल्कि गांव के मरीज भी दवाइयों का अच्छा असर होने की वजह से इलाज कराने आते थे। रोज 30 से 40 मरीजों का इलाज होता था, लेकिन निगम ने सब कुछ जानने के बाद भी इसे बंद करने का निर्णय ले लिया। आयुर्वेदिक औषधालय को बंद कर भवन में सरकारी हौम्योपैथिक अस्पताल का संचालन किया जा रहा।
मेडिकल अफसर थे पदस्थ, अब दूसरे विभाग का काम देख रहे
आयुर्वेदिक औषधालय में मेडिकल अफसर डॉ. विनय मेश्राम की पदस्थापना थी। इनके पहले भी मेडिकल अफसर यहां कार्यरत थे। औषधालय के नाम से ही निगम में डॉक्टर की नियुक्ति हुई हैं, पर विडंबना है कि अस्पताल को बंद करने के बाद निगम प्रशासन डॉक्टर से हेल्थ उपचार संबंधी काम लेना छोड़कर पेंशन योजना, स्मार्ट कार्ड, विवाह पंजीयन, जनगणना, श्रद्धांजलि योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन सहित अन्य विभागों का प्रभार सौंप दिया है।
अस्पताल में काम कम, खर्च ज्यादा
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग के चेयरमैन बलवंत साव ने कहा कि आयुर्वेदिक औषधालय में मरीज कम आते थे। यहां काम कम और स्थापना व्यय अधिक हो रहा था। इस वजह से बंद करना पड़ा।