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हिन्दू तो देशवाची शब्द : हिन्दुस्तान को अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि माने वही हिन्दू है

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष (20 मार्च, 2025) के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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जयपुर

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Neeru Yadav

Apr 02, 2025

15 मार्च 1995 के अंक में ‘धर्म निरपेक्षता: देश की पहचान को मिटाने का प्रयास’ आलेख से

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हाल ही दुनिया में शांति और समृद्धि लाने के लिए सौहार्दपूर्ण और संगठित हिन्दू समाज के निर्माण का प्रस्ताव पारित किया है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी हिंदू धर्म को सबके कल्याण की कामना करने वाला विश्व धर्म बताते रहे हैं। कुलिश जी ने तीस वर्ष पहले ही इस आलेख में धर्मनिरपेक्षता की नीति पर सवाल खड़े किए। लिखा कि हिन्दू नाम से, इतिहास से और शास्त्र सम्मति से कोई धर्म, सम्प्रदाय, मत या पंथ नहीं है। जो अपने आपको हिन्दू माने वही हिन्दू है। आलेख के प्रमुख अंश-

धर्म निरपेक्षता का कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। हमारे देश में क्यों लाया गया यह भी कोई नहीं समझता। संविधान में जोड़ दिए जाने के बाद भी इसकी व्याख्या नहीं की गई। इस शब्द की अवधारणा के पीछे कोई विचार ही नहीं। इस शब्द का उपयोग हमारे देश में जिस तरह से हो रहा है वह केवल उन लोगों को धिक्कारने के लिए होता है जो अपने आपको हिन्दू कहते हैं। अब जरा हिन्दू शब्द पर विचार कर लीजिए। हिन्दू नाम से, इतिहास से और शास्त्र सम्मति से कोई धर्म, सम्प्रदाय, मत या पंथ नहीं है। जैसे कि ईसाई, मुसलमान, बौद्ध, जैन या यहूदी हैं। धर्म के रूप में हिन्दू जैसी कोई पहचान या परिभाषा नहीं है। हमारे किसी भी शास्त्रों में हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। हिन्दू तो विशुद्ध रूप से देशवाची शब्द है। हमने धर्म को ईश्वरीय नियमों का संघात माना है और मानवकृत व्यवस्था को मत-पंथ का नाम दिया है। किसी देवता को माने या न माने, किसी शास्त्र को माने या न माने, किसी रीति-रिवाज, वेशभूषा और खान-पान को माने या न माने, किसी पर्व को माने या न माने यहां तक कि ईश्वर और उसके अवतार को भी माने या न माने। किन्तु हिन्दुस्तान को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि माने वही हिन्दू है। अब जरा धर्मनिरपेक्षता के प्रादुर्भाव की पृष्ठभूमि पर भी विचार करें। धर्म निरपेक्षता का कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। दुनिया का कोई देश धर्मनिरपेक्ष होने की दुहाई नहीं देता। हमारे देश के शब्दकोशों में तो इस शब्द का अस्तित्व ही नहीं था। परंतु यह कैसे हम पर लाद दिया गया। इसके पीछे भी एक विशेष प्रकार की मन:स्थिति रही है। इसी मन:स्थिति के कारण संविधान बनाते समय हमारे देश का प्रचलित नाम बदल दिया गया। इस देश का प्रचलित नाम हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान रहा है। पूरी आजादी की लड़ाई हमने इसी नाम को लेकर लड़ी। पर संविधान निर्माताओं ने न जाने क्या सोच-विचारकर इस देश का नाम इंडिया दैट इज भारत कर दिया। उन्हें लगता था कि इस देश का नाम यदि हिन्दुस्तान रह गया तो यहां के नागरिक हिन्दू ही कहलाते रहेंगे।

(15 मार्च 1995 के अंक में ‘धर्म निरपेक्षता: देश की पहचान को मिटाने का प्रयास’ आलेख से)

सींग न पूंछ
हिन्दू- हिन्दू कर रह्या,
जाणै सींग न पूँछ।
रोज मरोड्याँ जा रह्या,
अपणी-अपणी मूँछ।।
(सात सैंकड़ा से)

हिन्दुत्व के नाम पर…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परिभाषा है कि जो कोई इस देश को अर्थात हिन्दुस्तान को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है वह हिन्दू है। संघ की ही प्रतिकृति भारतीय जनता पार्टी भी इस भाषा को मानती तो है परन्तु उसका व्यवहार ऐसा रहा है कि वह मुसलमान को एक मजहबी पहचान से ज्यादा नहीं मानती। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और इसी थोक में आने वाले लोग मुसलमान को अल्पसंख्यक मानते हैं और धर्मनिरपेक्षता के नारे से उनको अपनी ओर रिझाते रहते हैं। ये दल संघ परिवार को साम्प्रदायिक कहकर मुसलमानों का शत्रु बताते हैं। मुसलमानों का भी रवैया यह हो गया है कि वे हिन्दुस्तान के वाशिंदे होने के नाते अपने आपको हिन्दू कहलाना पसंद नहीं करते और हिन्दू मात्र से अपने को अलग मानते हैं। जो हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करते हैं उनसे मुसलमान कतराते या चिढ़ते हैं।
(कुलिश जी के आलेखों पर आधारित पुस्तक ‘दृष्टिकोण’में ‘भारतीय मुसलमान की पहचान और त्रासदी’आलेख के अंश)

अटूट विश्वास
हर भारतवासी की तरह मुझे अपने देश पर गर्व है। यह मेरी अटल धारणा है और मुझे अटूट विश्वास है कि हमारा देश विश्व मानचित्र पर एक शक्ति के रूप में अभ्युदित होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश की मूल रचना में…इसकी नाभि में .. हमारे शास्त्रों के रूप में.. वेदों के रूप में ऐसा अमृत भरा है जो इसको कभी नष्ट नहीं होने देंगे। इन शास्त्रों में, धर्मग्रंथों में ऐसा व्यापक शाश्वत सनातन भाव निहित है जो व्यष्टि को समष्टि के साथ जीवन जीने का मार्ग दिखाता है। दृष्टि देता है। इस तरह के संस्कार, सर्वमंगलभाव हमारे शास्त्रों ने मानव को दिए हैं जो हर भारतवासी के व्यवहार में व्याप्त है। यहां लोग समष्टि भाव व वैश्विक दृष्टि से सोचते हैं।
(‘धाराप्रवाह’से)