नागौर. रंगमंच (थियेटर) यह ऐसी जगह है, जो कलाकारों को मांजती है, निखारती है और उन्हें एक पहचान देती है। आज विश्व रंगमंच दिवस है। भारत में खासतौर पर हिन्दी रंगमंच से जुड़े लोगों के लिए आज भी रंगमंच एक चुनौती की विधा है। रंगमंच का बुनियादी काम है सुप्त समाज को जागृत करना। जनजागरण के इस अभियान में गंभीरता और एकरसता होगी तो संदेश नहीं जा पाएगा, इसीलिए मनोरंजन के साथ जोड़ा गया। पिछले कुछ समय से रंगमंच कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। जिस तरह की चुनौतियों से हिन्दी रंगमंच को सामना करना पड़ रहा है और जिस तरह वह चुनौतियों के बीच अपने आप को जीवित ही नहीं, बल्कि सक्रिय बनाए रखा है, वह सचमुच में विश्व रंगमंच दिवस को सार्थक करता है। हिंदी रंगमंच और रंगकर्म के समक्ष चुनौतियां बहुत हैं, जिनसे जूझना और निजात पाना आसान नहीं है। इसी को लेकर पत्रिका ने रंगमंच से जुड़े कुछ कलाकारों से बात की, जो आज भी जिले में रंगमंच को जीवित रखे हुए है।
रंगमंच को जीवित में कई चुनौतियां
रंगमंच के दौरान कई चुनौतियां आती हैं, सबसे बड़ी चुनौती अर्थ की है। सब लोग पाश्चात्य की ओर दौड़ रहे हैं। आजकल के बच्चे और युवा सोशल मीडिया पर टाइम पास कर रहे हैं, लेकिन जब वे संस्कृति से जुड़ेंगे तो उन्हें बहुत कुछ जानने को मिलेगा, ज्ञान होगा। संस्कारवान बनेंगे। रंगमंच की ओर लोगों का रुझान बढ़े तो कलाकारों को संबल मिलेगा। नागौर में रंगमंच होना चाहिए, सरकारी सहयोग की भी आवश्यकता है।
– वसुंधरा तिवारी, रंगमंच कलाकार
नागौर में बने रंगमंच
बचपन से ही रंगमंच से जुड़ा हुआ हूं। उस समय लोगों का बहुत समर्थन मिलता था, इसलिए कलाकारों में जोश रहता था। 1998 में जब मैं नागौर आया तो यहां मैंने यहां रंगमंच तैयार करने का प्रयास किया। 2016 में पहली बार हमने रामलीला का आयोजन किया, लेकिन दर्शकों की संख्या बहुत कम रही। पहले जहां हजारों में दर्शक आते थे, वहां 2016 में 50-100 तक सिमट गए। फिर 2017 मेंराजस्थान पत्रिका के साथ मिलकर रामलीला का आयोजन किय, जिससे हमें काफी संबल मिला। उसके बाद से हमने प्रयास जारी रखे और सीमित संसाधनों में रंगमंच का आयोजन जारी रख रहे हैं। इसके लिए खासकर बालिकाओं को नि:शुल्क तैयार करवाता हूं। नागौर में रंगमंच की आवश्यकता है।
– श्रद्धानंद तिवारी, रंगमंच कलाकार
सरकारी सहयोग की आवश्यकता
रंगमंच में हमारे परिवार की लगभग यह तीसरी पीढ़ी है और मुझे गर्व है कि मैं भी इसका एक छोटा हिस्सा हूं। बढ़ती टेक्नोलॉजी के कारण हमारे मंडल के लगभग 100 कलाकारों का जीवन संघर्षमय हुआ है। मेरा हमेशा प्रयास रहता है कि सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार नुक्कड़ नाटक के माध्यम से करवाकर लोक कलाकारों को रोजगार मुहैया करवाऊं। सरकार की ओर से आज तक कलाकारों के लिए कोई विशेष योजना लागू नहीं की गई है। राज्य सरकार की ओर से स्थापित संगीत नाटक अकादमी जोधपुर में अध्यक्ष पद रिक्त होने से अकादमी से भी कलाकारों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। मुख्यमंत्री से निवेदन है कि जल्द अध्यक्ष पद की नियुक्ति करें और किसी कलाकार को ही अध्यक्ष बनाएं, ताकि कलाकारों की पीड़ा समझ सके एवं कलाकारों को उचित लाभ मिल सके।
– स्वरूप देहरा, निर्देशक, श्याम लोक कला मंडल
रंगमंच में देखे कई उतार-चढ़ाव
रंगमंच में 60 वर्षों से भी ज्यादा का समय अनुभव है। बचपन से रामलीला मंचन एवं अन्य नाटकों का प्रदर्शन करता आ रहा हूं। सोशल मीडिया के कारण जमीन आसमान का फर्क आ गया है, लेकिन हमने मंच पर हमेशा मर्यादित भाषा का उपयोग किया है। सोशल मीडिया में इस चीज का कोई दायरा नहीं है, फिर भी पिछले कुछ सालों से लाइव का जमाना आया है। हमें लोग वापस बुलाने लगे हैं। जब टीवी का जमाना नहीं था, तब हमारा रंगमंच मनोरंजन का एक मात्र साधन था, तब से लेकर आज तक हमने बहुत उतार-चढ़ाव देखे। राज्य सरकार की ओर से कलाकारों के लिए कोई पेंशन या अनुदान व्यवस्था नहीं है, इसका मुझे आत्मीय दु:ख है। कलाकार लोक संस्कृति को जीवित रखने एवं लोगों के मनोरंजन के लिए अपना जीवन बिता देते हैं, लेकिन सरकार का उन पर कोई ध्यान नहीं है। मेरा अब तक का जीवन केवल रामजी के नाम का प्रचार-प्रचार के लिए समर्पित रहा है।
– रामनिवास देहरा, अध्यक्ष, बजरंग रामलीला मंडल, नागौर