
Rajyoga In Kundali: बृहद् पाराशर होरा शास्त्र के मुताबिक ज्योतिष में दो तरह के योग होते हैं। पहला योग वो जो कुण्डली के भावों से बनता है जबकि दूसरे प्रकार का योग वो होता है जो ग्रहों से बनता है। ज्योतिष के सबसे शक्तिशाली और शुभ योग या राजयोग ग्रहों से नहीं बल्कि कुण्डली के भावों से बनते हैं, जिसे ज्योतिष की भाषा में “भाव योग” कहा जाता है। ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में कुल 32 प्रकार के मुख्य राजयोग बताए गए हैं। इनमें भाव से बनने वाले कुछ शक्तिशाली राजयोग हैं विपरीत राजयोग, परिवर्तन योग आदि। यहाँ एक बात और आपको बता दें कि भावों से बनने वाले राजयोग में नवमांश कुँडली का महत्व बढ़ जाता है।
कुण्डली के भावों से बनने वाले योग जिन्दगी भर अपना फल देते हैं जबकि ग्रहों से बनने वाले योग के साथ ऐसा नहीं होता है। ग्रहों से बनने वाले शुभ योग के प्रभाव के लिए हमें उस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा का चलना ज़रूरी होता है। मगर भावों से बनने वाले राजयोग के लिए ऐसा नहीं है खासतौर पर तब जब ये राजयोग नवमांश कुण्डली के साथ बन रहा हो या फिर केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों के परिवर्तन से बन रहा हो। कुण्डली में दो या दो से अधिक ग्रह एक साथ किसी भाव में बैठ जाएं या फिर वो अलग-अलग भावों में बैठकर एक-दूसरे पर दृष्टि डाल रहे हों तो इस प्रकार से बनने वाले योग को ग्रहों के द्वारा बनने वाला योग कहा जाता है। जिसे ज्योतिषीय भाषा में युति और प्रतियुति कहा जाता है। ये योग शुभ भी हो सकते हैं और अशुभ भी। हम आज यहाँ बात करेंगे कुण्डली के भावों से बनने वाले शुभ योगों की अर्थात राजयोग की।
नवमांश कुण्डली का महत्व
कुण्डली के भावों से बनने वाले योग में नवमांश कुण्डली का महत्व बढ़ जाता है। भावों से बनने वाला सबसे शुभ और शक्तिशाली राजयोग होता है उदित नवमांश का वर्गोत्तमी होना। इसे इस वजह से शक्तिशाली माना जाता है क्योंकि उदित नवमांश के वर्गोत्तमी होने से कुण्डली के दो या तीन भाव स्वतः भावोत्तम हो जाते हैं अथवा दो या तीन ग्रह स्वतः वर्गोत्तम हो जाते हैं। नवमांश कुण्डली में किसी भाव या ग्रह का भावोत्तम होना या वर्गोत्तम होना बहुत शक्तिशाली राजयोग माना जाता है। ये अपनी दशा और अन्तर्दशा में तो शुभ फल देते ही हैं इसके अलावा ये अपने भाव से सम्बन्धित मामलों में लगातार शुभ फल देते रहते हैं।
विपरीत राजयोग
भाव से बनने वाला दूसरा सबसे शक्तिशाली राजयोग होता है विपरीत राजयोग। विपरीत राजयोग का मतलब होता है कुण्डली में त्रिक भाव (6,8 और 12) के स्वामियों का त्रिक भाव में ही रहना। अर्थात् छठे भाव का स्वामी अगर 8वें भाव या 12वें भाव हो, आठवें भाव का स्वामी अगर 6वें या 12वें में हो या फिर 12वें भाव का स्वामी 6ठें या 8वें भाव में मौजूद हो, तब ये राजयोग बनता है। इसे विपरीत राजयोग इस वजह से कहा जाता है क्योंकि ये राजयोग बेहद विपरीत परिस्थितियों में बनता है।
भाव पर दृष्टि
भाव से बनने वाला अगला महत्वपूर्ण योग है जब कुण्डली में किसी भाव का स्वामी अपने भाव पर दृष्टि डाल रहा हो। इसमें भाव कारक भी शामिल है अर्थात् किसी भाव का कारक ग्रह अपने उस भाव पर दृष्टि डाल रहा हो तो भी वो हमेशा शुभ और अच्छा परिणाम देता है। यही वजह है कि लग्नेश का लग्न में बैठने से कहीं बेहतर होता है लग्नेश का लग्न पर दृष्टि डालना। कुछ व्यक्तियों की कुण्डली में कोई राजयोग या लक्ष्मीयोग नहीं होता उसके बावजूद वो सफल और धनवान होते हैं ऐसा इसीलिए होता है कि उनकी कुण्डली में भाव का स्वामी अपने भाव को देख रहा होता है। जैसे अगर दशमेश दशम भाव में बैठा हो तो वो सिर्फ अपनी दशा में ही अच्छे परिणाम देगा बावजूद इसके अगर दशमेश चतुर्थ भाव में बैठ कर दशम भाव पर दृष्टि डाल रहा हो तो वो हमेशा अच्छे परिणाम देगा।
भाव परिवर्तन योग
भाव से बनने वाला अगला शुभ योग है केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों का भाव परिवर्तन करना। अर्थात केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में और त्रिकोण का स्वामी केन्द्र में। इसमें ज्यादातर लोग यही मान सकते हैं कि ये ग्रहों से बनने वाला योग है। मगर ये ग्रह से ज्यादा भाव का स्वामी महत्वपूर्ण होता है। केन्द्र और त्रिकोण के भाव के स्वामियों का परस्पर एक-दूसरे के भाव में बैठने से केन्द्र और त्रिकोण हमेशा सक्रिय रहते हैं। चूँकि ये कुण्डली के सबसे शुभ भाव होते हैं इसलिए इनके लगातार सक्रिय होने से जीवन में ज्यादातर शुभ फलों की प्राप्ति होती रहती है।
Published on:
22 Oct 2021 06:47 pm

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