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यहां दिवाली की एकम को गौ पूजा करने का रहा है महत्व, विलुप्त हो रही परंपरा

आज के समय में गौ पालकों ने पशुओं को आवारा छोड़ दिया है

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ललितपुर. गोवंश के साजो श्रृंगार के सामान बेचने वाले दुकानदार इस दीपावली पर बाजार में अपनी दुकानें लगाई थी। उन्होंने सोचा कि दीपावली की एकम के दिन गौवंशों की पूजा की जाती है। इसलिए उनका सामान बिकेगा और वह अपने परिवार में दीपावली की खुशियां मिलकर मनाएंगे। इसके साथ ही हिन्दू धर्म में ग्वालन की पूजा का महत्त्व भी है। मगर महंगाई के चलते ऐसे सामानों की बिक्री कम रही जिससे हालात उल्टे ही नजर आए। आज के समय में गौ पालकों ने पशुओं को आवारा छोड़ दिया है। वह अपने गोवंश को संरक्षित करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं और जिसका परिणाम यह हुआ कि वह पशु आवारा अन्ना जानवरों के नाम से मशहूर हो गए।

हालांकि, योगी सरकार का ध्यान इस तरफ गया और उन्होंने पहल करते हुए अन्य पशुओं को संरक्षित करने के लिए गौशालाये खुलवाई। मगर गोपालकों की इस बेरुखी ने जहां एक ओर गोवंशओं के साजो श्रृंगार के सामान बनाने और बेचने वालों व्यापारियों को बेरोजगार कर दिया। वहीं दूसरी ओर गौवंश पूजन की बैदिक परम्परा का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है।

अगर पांच साल पहले की बात की जाए तो गोवंश को भगवान का दर्जा देकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती थी। समय-समय पर गाों का श्रृंगार पूजा आदि भी जाता था। मगर पिछले पांच सालों से गोपाल को की बेरुखी के चलते गोवंशों का जीवन खतरे में पड़ गया है। यहां तक कि उन्हें अन्ना पशुओं आवारा पशुओं की संज्ञा दी जा रही है और यही बेरुखी गोवंश साजो श्रंगार के व्यापारियों पर आफत के बादल बनकर टूट पड़े हैं। इस संबंध में सदर विधायक रामरतन कुशवाहा ने कहा, ‘हम अपनी सदियों पुरानी वैदिक गोवंश पूजन की परंपरा को यूं ही विलुप्त नहीं होने देंगे। इस दिशा में हम और हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा हमारे साधु-संतों द्वारा पुरजोर यह कोशिश की जा रही है। हम अपने बन्धुओं गौपालकों को इस परंपरा को निभाने तथा गोवंश को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करेंगे जिससे हमारी परंपरा यूं ही चलती रहे और हमारी गौ माता को भी आश्रम मिलता रहे।’