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15 अगस्त 1947: जनता के रॉबिनहुड और अंग्रेजों के लिए काल थे टंट्या मामा

ऐसे तीरंदाज जो बिना देखे लक्ष्य साध लेते थे, सालों बाद टंट्या मामा की जन्मस्थली का पता चला

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खंडवा. आजादी के योद्धा टंट्या भील देश के पहले रॉबिनहुड थे। लोकप्रियता ऐसी की मामा का संबोधन आम हो गया था। जनता के लिए जितने सहज अंग्रेजों के लिए उतने ही खतरनाक। हथियार के नाम पर महज तीर और धनुष से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे।

अंग्रेजी हुकूमत उनके गुरिल्ला युद्ध कौशल से खौफ खाती थी। लेकिन शहादत के बाद वे बरसों तक इतिहास में पन्नों में गुम रहे। सालों बाद उनकी जन्मस्थली दुनिया के सामने आई। अब यहां स्मारक बन चुका है।

रॉबिनहुड यूरोप का नायक था। वह अमीरों से लूटता और जरूरतमंदों को बांटता था। टंट्या मामा मालवा के लिए ऐसे ही थे। टंट्या मामा खंडवा जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर बड़ौदा अहीर में जन्मे थे। उनकी वीरता की कहानियां लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में सिमटी रही। सरकार ने जन्मस्थली पर स्मारक बनवाया तो बड़ौदा अहीर के जन-जन के मन में टंट्या मामा से जुड़ी कहानियां उत्साह से हिलोरे ले रहीं हैं। यहां तक कि कुछ साल पूर्व ही टंट्या मामा के परिजन को इस बात का ज्ञान हुआ कि वे टंट्या के परिवार से हैं। स्मारक बनने के बाद अब गांव वालों से कोई टंट्या मामा की बात करता है वे गर्व से प्रफुल्लित हो उठते हैं।

अभी टंट्या मामा की जन्मभूमि में बहुत कुछ होना बाकी
बड़ौदा अहीर की सरपंच सुशीला बाई और उनके पति विक्रम ग्वाले ने बताया कि देश के इतने बड़े ₹ांतिकारी की जन्मस्थली का सरपंच होने पर गर्व है। यहां बच्चे-बच्चे की जुबान पर टंट्या मामा के शौर्य की अलग-अलग कहानियां हैं। अब सरकार को चाहिए कि गांव में हाइस्कूल, अस्पताल और अच्छी सड़क जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवा दे।

ग्रामीण अमरा सिरसाठे टंट्या के सुने-़सुनाए किस्सों को याद करते हुए कहते हैं कि पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, हमें लगता है कि इस माटी में जन्मे टंट्या ने अपने प्राणों की आहुति आजादी के लिए दी। यह सोच कर ही मन गर्व से विह्वल हो जाता है।