
17 वीं से 19 शताब्दी के दुर्लभ ग्रन्थ बन सकते है शोधार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण...जानिए क्या है खास
NANDKISHOR SARASWAT
जोधपुर. राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी में विभिन्न विषयों की पाण्डुलिपियों के साथ ही धार्मिक साहित्य संस्कृत, राजस्थानी, हिन्दी, बृज आदि भाषाओं का धार्मिक साहित्य और पेंटिंग्स का भण्डार शोधार्थियों के लिये अत्यन्त ही उपयोगी साबित हो सकता है। संस्थान में धर्म सम्बन्धी साहित्य विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों के रूप में संरक्षित हैं। मूल संस्कृत के ग्रन्थों में मुख्य रूप से रामायण, पुराण, महाभारत आदि के रूपान्तरण के रूप में विपुल साहित्य सुरक्षित हैं। राजस्थानी भाषा में रामायण सार, राम रो बारेमासो, रामजस, रामचन्द्रिका आदि ग्रन्थ संग्रहित हैं । हिन्दी में रामबत्तीसी, रामचरित, रामरासो, रामचरित प्रबन्ध शामिल हैं। पुराणों में वर्णित विभिन्न व्रतों की कथाएं रामायण का अयोध्या काण्ड, आदि संस्कृत के ग्रन्थों का विशाल कोष उपलब्ध हैं। इसके अलावा विष्णु, शिव हनुमान्, लक्ष्मी, दुर्गा आदि विभिन्न देवी-देवताओं के स्तोत्र, कवच, सहस्रनामावलियां, अष्टक, आदि प्रमुख हैं।
लिपी आधुनिक देवनागरी के समान
भारतीय संस्कृति में श्रीमद भगवद गीता का अत्यन्त महत्त्व है । महाभारत में प्रधान रूप से जो गीता का स्वरूप हमें दिखाई देता है उससे भिन्न भी कई गीता प्राप्त होती है । इनमें नारदगीता, अर्जुन गीता, शिवगीता, अवधूत गीता आदि ग्रन्थ महत्वपूर्ण हैं। एक श्लोकी रामायण तथा चतुःश्लोकी भागवत् भी उपलब्ध है। वेदों के सन्दर्भ में देखा जाय तो यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्याय का पाठ भी है। ये सभी ग्रन्थ 17 शताब्दी से लेकर 19 शताब्दी के हैं। इनमें से बहुधा ग्रन्थ पूर्ण हैं। इनकी लिपि भी इसी काल के अनुसार 17 वीं शताब्दी से लेकर 19 शताब्दी के मध्य की है। जो कि आधुनिक देवनागरी के समान ही है।
योगमय चित्रों का संकलन
संस्थान में पौराणिक साहित्य के आधार पर बनाई पेण्टिंग का भी संरक्षण किया गया है। इन पेण्टिंग्स में नाथ सम्प्रदाय से प्रभावित चित्रकारी, रामायण, व पुराणों में वर्णित देवताओं के चरित्र को प्रकट करती हुई चित्रकारी तथा विष्णु, ब्रह्मा, आदि के क्षीरसागर में शेषशय्या पर विराजमान होने तथा शिव व विभिन्न देवियों के योगमय चित्रों का संकलन भी है।
शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण
धर्म से सम्बन्धित संस्कृत के ग्रन्थों का विशाल कोष राजस्थानी शोध संस्थान में संरक्षित है। पुरामहत्त्व की मौजूदा सामग्री शोधार्थियों के लिए उपलब्ध है। खास तौर से इतिहास, चित्रकला, संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी आदि विषयों के शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है।डॉ. विक्रमसिंह भाटी, सहायक निदेशक, राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर।
Published on:
18 Jun 2022 11:30 am

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