
स्थापना दिवस विशेष- मारवाड़ के खानपान की परंपरा में ‘खावण-खण्डा’
जोधपुर. हमारे मारवाड़ में बहुत ही पुरानी एक कहावत है कि ‘भूत बण र कमावणो, और डाकी बण र खावणो’, यानी धन कमाने के लिए भूत की तरह मेहनत करो और खाना खाने में कोई कोर-कसर न छोडकऱ डाकी यानी शाही तरीक़े से दबाकर खाओ.....। कई बार लोग हंसी ठिठोली में कहते हैं कि जोधपुर की दो चीजें मशहूर है, एक तो ‘खण्डा’ और दूजा ‘खावण खण्डा’.. इस ‘खावण-खण्डा’ शब्द से अनभिज्ञ कुछ लोग ‘खावण गण्डा’ भी लिखते हैं।
हां तो, सबसे पहले तो ‘खण्डा’...मारवाड़ का प्रसिद्ध छीतर पत्थर, जिसकी देश-विदेश में अपनी एक अलग पहचान है, कई मशहूर इमारतें इन्हीं कलात्मक खण्डा पत्थरों के वजूद पर टिकी है। दूजा ‘खावण खण्डा...।’ जो लोग मारवाड़ की पारम्परिक खानपान की संस्कृति से अपरिचित हैं या अनभिज्ञ हैं, वे हंसी-ठिठोली में हम मारवाड़ी लोगों के लिए ऐसा कहते हैं। दरसअल, हम मारवाड़ी लोग ‘खावण खण्डा’ यानी असली भोजनभट्ट है, ना कि खावणसुरा यानी असुर (राक्षस) की तरह खाने वाले या पेटू।
मारवाड़ में लोग हरेक मौसम के अनुसार हर जायके का रसास्वादन यानी भोजन के हर एक रस का आस्वादन यानी स्वाद लेते हैं। मारवाड़ी लोग खाने के मामले में ज्यादा सेलेक्टिव और असली जायकों के जानकार हैं। मारवाड़ी ऐसे नहीं हैं कि कुछ भी उल्टा सीधा बनाया और खा लिया। मारवाड़ में मिठाई मिष्ठान्न को मुख्य भोजन यानी मेन कोर्स में खाया जाता है, न कि डेजर्ट यानी भोजन के अंत में, जैसे कि कई अन्य लोग जतन जोगी मतलब औपचारिक रूप में खाते हैं। इसलिये जब भी हम भोजन करते हैं तो मारवाड़ की भोजन (जीमण) परंपरा के अनुसार परोसी हुई थाली में से सबसे पहले मीठा, मिठाई का भरपूर आनंद लेते हैं। इसके बाद थाली में परोसी हुई सब्जी, अचार, पूड़ी का स्वाद... बाद में तेहरी, पुलाव कबुली चावल का जायका लेने के बाद पापड़ सलेवड़ा खीचिया या अन्य नमकीन फरसाण स्नेक्स आदि का आनंद लेने के बाद। अंत में दही रायता से अपना भोजन पूरा करते हैं।
और, मारवाड़ की इसी भोजन परम्परा को हम लोग खाने खिलाने में, अपने अतिथियों (पावणों) के सत्कार में (मेहमान नवाजी) भी बख़ूबी निभाते हैं। इसलिए हम गर्व से कहते हैं.. हां, हम मारवाड़ी लोग ‘खावण-खण्डा’ हैं।
Published on:
14 Dec 2021 09:06 pm

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