
अविनाश केवलिया
हमारी स्वास्थ्य आदतें कोरोना के बाद कुछ हद तक बदली थी, लेकिन अब फिर से बेपटरी होने लगी है। यह बात लगातार सामने आ रही लाइफ स्टाइल, बीमारियों, एक्सपर्ट चिकित्सक और राजस्थान पत्रिका के पब्लिक सर्वे में स्पष्ट होता है। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर पत्रिका ने इसी मुद्दे पर विशेष स्टोरी।
करीब पांच साल कोरोना ने जिस हद तक हमें स्वास्थ्य के लिए डराया था, वह डर अब खत्म हो गया है। करीब एक साल तक लोगों ने इसे गंभीरता से लिया, लेकिन अब पिछले तीन साल में फिर से लापरवाही के रास्ते पर चलने लगे हैं। राजस्थान पत्रिका की ओर से जनता के बीच करवाए गए सैम्पल सर्वे में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि 35 प्रतिशत लोग प्रतिदिन अपने शरीर को समय ही नहीं देते। यानी न तो वॉकिंग न योग और न ही किसी प्रकार की कसरत। यही कारण है कि तेजी से मोटापा व बीमारियां बढ़ रही है।
वॉकिंग, जिम, योग या साइकिलिंग के जरिए आप अपने स्वास्थ्य के लिए दिन में कितना समय देते हैं?
सप्ताह में कभी-कभी - 35 प्रतिशत।
प्रतिदिन 30 मिनट - 25 प्रतिशत।
30 मिनट से 1 घंटे तक - 16 प्रतिशत लोग।
1 घंटे से ज्यादा 18 प्रतिशत लोग।
क्या आप खुद या अपने परिवार के किसी अन्य का साल में एक बार रूटीन चैकअप करवाते हैं।
हां- 66 प्रतिशत
नहीं - 32 प्रतिशत
कोई जवाब नहीं - 2 प्रतिशत
क्या आपने कोई स्वास्थ्य बीमा करवा रखा है?
हां - 56 प्रतिशत
नहीं - 43 प्रतिशत
पता नहीं - 1 प्रतिशत
स्वास्थ्य बीमा पर एक साल का कितना खर्च करते हैं?
10 से 20 हजार - 35 प्रतिशत
20 से 40 हजार - 12 प्रतिशत
40 हजार से ज्यादा - 15 प्रतिशत
नहीं खर्च करते - 25 प्रतिशत
कोई जवाब नहीं - 13 प्रतिशत
प्रिवेंटिव हेल्थकेयर प्रोडक्ट का आकार बढ़ा है। पूरे देश में इन प्रोडक्ट का मार्केट इस साल के अंत तक करीब 8 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है। जोधपुर में प्रतिमाह 2 करोड़ से भी ज्यादा के उत्पाद बिक्री होते हैं।
स्वास्थ्य बीमा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अब तो कई कम्पनियां भी इसी सेक्टर में आ रही है। पत्रिका के सर्वे के अनुसार 56 प्रतिशत लोगों ने अपने या अपने परिवार का स्वास्थ्य बीमा करवा रखा है। हालांकि दो तिहाई लोगों ने यह भी कहा कि वे अपने व अपने परिवार का साल में एक बार रूटीन चेकअप जरूर करवाते हैं। हालांकि अधिकांश लोगों को बीमा कवर के संबंध में जानकारी नहीं है।
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हेल्दी बिगनिंग फॉर होपफुल फ्यूचर इस बार की थीम रखी गई है। स्कूल जाने वाले बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है। कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास के कारण बच्चों का फिजिकल मूवमेंट कम हो गया। एक्टिविटी कम हो गई और बाजार के फूड का सेवन बढ़ा है। न्यूक्लियर फैमिली का जमाना है, ऐसे में सबसे ज्यादा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
जो जागरूकता कोरोना के समय आई, वह सिर्फ बीमा करवाने व जांच करवाने तक सीमित है। प्रिवेंटिव केयर व चिकित्सक की सलाह को गंभीरता से लेना लोगों ने बंद कर दिया है। लाइफ स्टाइल नहीं बदली, नशा करना नहीं छोड़ा। एक बात जो अच्छी है वह यह कि अब बीमारियों के डायग्नोस की सुविधा बढ़ी है।
Published on:
07 Apr 2025 04:47 pm
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