
झुंझुनूं के बड़ागांव में निकलती गणगौर की सवारी।
राजेश शर्मा
लोकपर्व गणगौर यूं तो लगभग पूरे राजस्थान में उल्लास से मनाया जाता है, लेकिन शेखावाटी के झुंझुनूं जिले के बड़ागांव का गणगौर मेला अपने आप में अनूठा है। यहां करीब तीन सौ साल से गणगौर पर मेला भरता है। अधिकतर जगह अकेली गणगौर की सवारी निकलती है, लेकिन उदयपुरवाटी क्षेत्र के बड़ागांव में सबसे आगे ईशर की सवारी निकलती है। इसके बाद बड़ी संख्या में सजीधजी हुई गणगौर निकलती हैं। खास बात यह है कि ईशर की बुकिंग एक साल पहले करनी पड़ती है। इस गांव में ईशर एक घर से निकलते हैं, जबकि जितने घरों में महिलाएं गणगौर का उद्यापन (उजीणा) करती हैं, उतने ही घरों से गणगौर निकलती हैं। गांव निवासी सेना से रिटायर्ड कैप्टन नवल सिंह ने बताया कि वर्ष 2016-17 में एक साथ 27 गणगौर निकली थी। किसी वर्ष पांच तो किसी वर्ष दस से पंद्रह गणगौर निकलती हैं।
महिला के पीहर पक्ष वाले गणगौर के दिन अपनी बहनों व बहन के ससुराल पक्ष के सदस्यों के लिए अपने सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र व उपहार लाते हैं। जितने घरों से गणगौर निकलती है उतने ही घरों में जीमण का कार्यक्रम होता है।
गांव निवासी अशोक सिंह शेखावत ने बताया कि अपने-अपने घरों से निकाली गई गणगौर को सबसे पहले गोपीनाथ मंदिर में लाया जाता है। सभी गणगौर आने के बाद यहां से बैंड बाजे के साथ गणगौर की सवारी निकाली जाती है। शाम करीब सवा तीन बजे के लगभग गणगौर की सवारी शुरू होती है। जो गांव के मुख्य रास्तों से होती हुई मेला मैदान में पहुंचती है। वहां पूजने वाली गणगौर को महिलाएं आसुओं के साथ कुएं में धमकाकर आती है। बड़ी गणगौर को वापस लाया जाता है। ईशर पहले हर गणगौर को उसके घर छोड़ते हैं इसके बाद आखिरी में खुद जाते हैं। इसी दिन अगले साल किसके घर से ईशर निकलेगा, इसकी बुकिंग हो जाती है। सवारी में होने वाला खर्चा सामूहिक होता है।
कई सालों से ईशर का शृंगार कर रहे उम्मेद सिंह ने बताया कि गणगौर का सौलह शृंगार महिलाएं करती है। जबकि ईशर का शृंगार पुरूष करते हैं। गांव के महिपाल सिंह व आजाद सिंह ने बताया कि मेला रात करीब आठ बजे तक भरता है। मेले में बडागांव, हांसलसर, हमीरवास, दोरासर, चारण की ढाणी, मालसर, बजावा व झुंझुनूं के लोग भी शामिल होते हैं।
Updated on:
31 Mar 2025 12:09 pm
Published on:
31 Mar 2025 12:08 pm
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