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रेगिस्तान में जल संकट कोई नया नहीं, सदियों से पानी सहेजने की अनूठी परंपरा

जब पूरा विश्व जल संकट से उबरने के प्रयास कर रहा है, तब राजस्थान का विशाल मरूस्थल सदियों से जल संकट से लड़ता आया है।

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जब पूरा विश्व जल संकट से उबरने के प्रयास कर रहा है, तब राजस्थान का विशाल मरूस्थल सदियों से जल संकट से लड़ता आया है। यह वह भूमि है जहां पानी की एक-एक बूंद सोने-चांदी से भी अधिक कीमती मानी जाती है। बरसात का जल यहाँ किसी वरदान से कम नहीं, जिसे सहेजने की परंपरा ने जैसलमेर-बाड़मेर को जल संरक्षण की अद्भुत मिसाल बना दिया। खासतौर पर जैसलमेर रियासतकाल में पालीवाल ब्राह्मणों की ओर से बसाए गए 84 गांव जल संरक्षण की अपनी विशेष प्रणालियों के लिए विख्यात रहे हैं। दशकों से जल संकट से जूझते इस मरूस्थल में पानी की हर बूंद कीमती रही है। वर्षा जल को संजोने और सहेजने की कला यहां की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। छोटी बेरियों, जोहड़ों और तालाबों के निर्माण से लेकर बड़े खड़ीनों तक, मरूधरा के लोग हर संभव तरीके से जल का संरक्षण करते आए हैं। पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में पानी की समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन यहाँ के निवासियों ने सदियों से इस संकट का सामना किया और जल प्रबंधन की अनूठी प्रणालियाँ विकसित कीं।

हर बूंद को समझा वरदान

मरूभूमि के लोग जल को धन-वैभव से अधिक मूल्यवान मानते आए हैं। बरसात का जल जब थोड़ी देर के लिए भी कहीं ठहरता, तो उसे संजोने की पूरी व्यवस्था की जाती थी। कई पीढिय़ों से यहां के लोग पानी को सहेजने के लिए श्रमदान और सामुदायिक प्रयासों से जल संरक्षण के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं। चाहे वह छोटे-बड़े तालाब हों या वर्षा जल संचयन के परंपरागत तरीके, हर व्यवस्था इस सूखी धरती को जीवन देने के लिए ही विकसित की गई।

खड़ीनों ने रचा था कृषि का इतिहास

पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी अद्वितीय जल प्रबंधन प्रणाली से 700 साल पहले जैसलमेर में 84 गांव बसाए। उन्होंने विशाल खड़ीनों का निर्माण किया, जो वर्षा जल को संचित कर फसलों की सिंचाई का कार्य करते थे। ये खड़ीनें न केवल जल संरक्षण का अद्भुत उदाहरण थीं, बल्कि इनकी मदद से गेहूं और चने की भरपूर पैदावार होती थी। इन गांवों के समृद्ध होने के पीछे यही जल संरक्षण प्रणाली थी, जिसने मरूभूमि को भी कृषि उत्पादन योग्य बनाया।

….. तो हो सकेगा जल संकट का समाधान

इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल का कहना है कि पालीवाल समाज की अपनाई गई जल संरक्षण पद्धतियाँ आधुनिक समय के लिए भी प्रेरणादायक हैं। आज जब जल संकट वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन चुका है, तब पश्चिमी राजस्थान के इन ऐतिहासिक जल प्रबंधन तरीकों से सीख लेकर नई योजनाएं बनाई जा सकती हैं। सरकार और समाज को मिलकर जल संरक्षण की इन परंपराओं को अपनाने की आवश्यकता है, ताकि मरूभूमि का यह संघर्ष एक नई दिशा में आगे बढ़ सके और पानी की हर बूंद को बचाया जा सके।

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