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जैसलमेर: रेत के शहर में बदली रचनात्मकता की परिभाषा, पारंपरिक कलाओं के बीच एआई ने उभारी नई संभावनाएं

जैसलमेर के युवा कलाकार अब डिजिटल टूल्स और एआई प्लेटफॉम्र्स की मदद से पारंपरिक शैली को नई अभिव्यक्ति दे रहे हैं।

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रेत की दीवारों और पारंपरिक कलाओं के लिए मशहूर जैसलमेर अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। सदियों पुरानी चित्रकला, लोक संगीत, मूर्तिकला और हस्तशिल्प के बीच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने रचनात्मकता की नई परिभाषा गढऩी शुरू कर दी है। यह तकनीक जहां कला के नए प्रयोगों और वैश्विक मंच पर पहचान का जरिया बन रही है, वहीं स्थानीय कलाकारों में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

कला के नए रंग

जैसलमेर के युवा कलाकार अब डिजिटल टूल्स और एआई प्लेटफॉम्र्स की मदद से पारंपरिक शैली को नई अभिव्यक्ति दे रहे हैं। कहीं रेत से बनी आकृतियां अब वर्चुअल रियलिटी में दिखाई दे रही हैं, तो कहीं लोक कथाओं को एआई आधारित एनीमेशन में बदला जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय कला का डिजिटलीकरण संभव हो रहा है, बल्कि यह नई पीढ़ी को भी जोड़ रहा है।

कलाकारों में उभरती जिज्ञासा और असुरक्षा

हालांकि एआइ के बढ़ते प्रभाव से कलाकारों के बीच जिज्ञासा तो है, लेकिन असुरक्षा की भावना भी कम नहीं। हस्तनिर्मित कलाओं की जगह यदि एआई जनित चित्र और डिज़ाइन्स लेने लगें, तो पारंपरिक कला का भविष्य क्या होगा? यह सवाल कई शिल्पकारों और चित्रकारों को चिंतित कर रहा है।

चित्रकार नथमल कहते है कि यदि अगर कंप्यूटर ही सब कुछ बना देगा, तो हमारी मेहनत, अनुभव और भावनाओं का क्या मूल्य रह जाएगा? वहीं दूसरी ओर युवा कलाकार पूजा चौरडिय़ा मानती हैं कि अगर हम एआइ को सहयोगी के रूप में लें, तो यह हमारी कला को वैश्विक पहचान दिला सकता है।

संभावनाओं का नया द्वार

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समय विरोध नहीं, समन्वय का है। कला और तकनीक के मेल से ऐसी नई अभिव्यक्तियां सामने आ सकती हैं, जो न पहले देखी गईं, न सुनी गईं। यदि जैसलमेर के पारंपरिक कलाकार एआई की भाषा को समझ लें, तो वे अपनी रचनाओं को डिजिटल दुनिया में नई उड़ान दे सकते हैं।

जरूरत है मार्गदर्शन और प्रशिक्षण की

स्थानीय स्तर पर एआइ आधारित कला की कार्यशालाएं और प्रशिक्षण शिविरों की मांग बढ़ रही है। ऐसे प्रयासों से न केवल कलाकारों की चिंता कम की जा सकती है, बल्कि उन्हें समय के साथ कदम मिलाकर चलने का अवसर भी मिल सकता है।

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