
'इबलीस: 'कान का कच्चा' रिश्तों का खून भी बहा देता है
जयपुर। इबलीस (शैतान) को इंसान के सामने सज्दा न करने के लिए खुदा ने जन्नत से बाहर निकाल दिया था। तब से इबलीस ने कसम खाई थी कि वह ता-कयामत इंसानों को बरगलाता रहेगा। रवीन्द्र मंच पर शनिवार को शैतान इबलीस और शेक्सपियर के 1603 में लिखे प्ले 'ओथेलो' के नाट्य रूपांतरण के रूप में नाटक का मिनी थियेटर में मंचन किया गया। निर्देशक शाहरुख खान अब्बासी ने इस नाटक के पात्रों के जरिए यह दर्शाने का प्रयास किया है कि शैतान किसी न किसी भेस में हमें झूठ और धोखे से बरगलाता है, इसलिए हमें कान का कच्चा नहीं होना चाहिए। यानी इंसान को अपना दिमाग हमेशा खुला रखना चाहिए और कानों सुनी बातों पर यकीन करने से पहले उसकी अच्छी तरह तस्दीक कर लेनी चाहिए। क्योंकि जरूरी नहीं कि जो हमें 6 नजर आ रहा हो, वह दूसरे किनारे से 9 हो सकता है।
शैतान को बैकग्राउंड में दर्शाया
नाटक में अनवर और परी एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। सत्ता की लालच में अनवर के भाई लाला दोनों प्रेमियों के बीच झूठ और गलतफहमियों की ऐसी दीवार खड़ी कर देता है, दोनों एक-दूसरे का सच न देख पाते हैं, न सुन पाते हैं। परी को एकतरफा प्यार करने वाला रोमी भी इस फरेब का शिकार हो जान गंवा बैठता है। वहीं, लाला के झूठ को पहचाने बिना अनवर परी की जान ले लेता है। लाला की पत्नी सुमोना आखिर में उसे भी मौत के घाट उतार देती है। लाला का किरदार जब-जब मंच पर आता है, बैकग्राउंड में दो राक्षसों को शैतान के रूप में दिखाया है। यानी सामने दिख रहे इस शख्स का असली रूप यह राक्षस है।
ईर्ष्या और झूठ के इर्द-गिर्द घूमते किरदार
प्यार, विश्वासघात और चालाकी की इस दुखान्तिका में हर किरदार, अपने-अपने सच का बोझ ढो रहा है। नाटक में माइकल (ओथेलो) मुख्य किरदार है, जिससे ईर्ष्या रखने वाला लाला उसे रास्ते से हटाने के लिए सारी हदें पार कर जाता है। शेक्सपियर ने इस प्ले में मानव स्वभाव की अंधेरी कोठरियों में बंद शैतान की सबसे घिनौनी तस्वीर पेश की है। नाटक दर्शाता है कि कैसे ईष्र्या और असुरक्षा की भावना किसी व्यक्ति की तर्कसंगत सोच को खत्म कर सकती है, जिससे रिश्तों का खून भी हो सकता है।
Published on:
16 Jul 2023 05:13 pm

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