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भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी अनुपम वस्तुओं का यहां है संग्रह, होती है पूजा

-सदियों से पूजी जा रही हैं वो तमाम वस्तुएं, जानें क्या है वास्तविकता...

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श्री कृष्ण भगवान

श्री कृष्ण भगवान

जबलपुर. प्रख्यात समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया ने लिखा, भगवान श्री कृष्ण भारतीय संस्कृति व सभ्यता के विस्तार हैं। अब न श्री कृष्ण हैं, न डॉ लोहिया पर कृष्णावतार की लीला, उनके द्वारा दिया गया ज्ञान सर्वत्र पूजित है। लेकिन इसके साथ ही यहां एक ऐसा समूह है जिसका दावा है कि उनके पास कन्हैया से जुड़ी वो तमाम वस्तुएं हैं, उन सभी वस्तुओं की भी विधिवत पूजा होती है। ये समूह है श्री जयकृष्णी पंथ।

बताया जाता है कि इस पंथ की नींव पड़ी थी 1267 ई. में और इसकी शुरूआत कराई थी चक्रधर स्वामी नें। भगवान चक्रधर स्वामी ने समाज को पांच अवतारों का दर्शन कराया। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, दत्तात्रेय महाराज, चक्रपाणी महाराज, गोविंद प्रभु और वे स्वयं। भगवान से जुड़ी वस्तुओं को इस पंथ के महंत बहुत संभालकर रखते हैं। महंत कृष्णराज बाबा बताते हैं कि इस पंथ के मुख्य 13 महंत थे, जिनके पास भगवान के उपयोग की हुई कोई न कोई वस्तु थी। इस परंपरा में गुरु अपने शिष्यों को समान रूप से पंथी धन देता है। जबलपुर में भगवान के वस्त्र के रूप में रेशम के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। इन्हें विशेष तौर पर मढ़वाकर कई परत के अंदर रखा जाता है। महंतों के पास भगवान के कपड़े ही नहीं अपितु सरौंता, सुपाड़ी के टुकड़े आइना सहित वे प्राचीन वस्तुएं हैं जिनका भगवान ने उपयोग किया था, जिसे यह पंथी धन के रूप में अपने पास रखते हैं। जबलपुर के श्री गोपाल मंदिर बाई का बगीचा में भगवान के कपड़े हैं, जिसे जन्माष्टमी सहित अन्य प्रमुख पर्वों पर पूजन किया जाता है।

इस मंदिर में 60 तीर्थों की शिलाएं मौजूद हैं। जिसमें मुख्य रूप से उत्तरप्रदेश के गोवर्धन पर्वत, महाराष्ट्र के रिद्धपुर, माहुर, फलटन, डोमेग्राम, बेलापुर, गुजरात के द्वारिका और मप्र के उज्जैन मुख्य रूप से शामिल हैं। जहां-जहां भगवान के चरण रज पड़े वहां के पत्थरों (पाषाण) को विग्रह के रूप में तैयार कर यह पंथ भगवान की प्रतिमा के पास स्थापित करता है। इस पंथ के पास आज भी 6500 से ज्यादा ग्रंथ संपदा है।

बाई का बगीचा स्थित श्री गोपाल मंदिर की स्थापना 1980 में हुई थी। इसके बाद मूर्ति स्थापना 1984 में की गई। छिंदवाड़ा में जन्मे महंत दत्तराज बाबा भक्तों के अनुरोध पर 1967 में अमरावती आश्रम महाराष्ट्र से आए थे। गीता मंदिर में सेवा करते हुए वे 1972 में निवृत्त हो गए थे। यहां सुंदरलाल पांडेय ने कुछ जमीन दान में दी और कुछ जमीन उन्होंने खरीदी। अपनी जमीन बेचकर और क्षेत्रीय लोगों की सहायता से 1980 में मंदिर बनवाया। इसके बाद 1993 में गोलोकवासी हुए। इसके बाद महंत कृष्णराज एवं परिवार ने 2002 में मंदिर का कलशारोहण किया।

"मेरे गुरु महंत दत्तराज बाबा ने परंपरानुसार भगवान के कपड़े दिए थे, जिसे खास तौर पर मढ़वाया गया है ताकि वो खराब न हो। इसे जन्माष्टमी, छठी और अन्य त्योहार में भगवान के पूजन में शामिल किया जाता है। यह पंथी धन है।"- महंत कृष्णराज बाबा, श्री गोपाल मंदिर, बाई का बगीचा

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