
amazing saint in jabalpur
जबलपुर. रेल दुर्घटना में दाहिना हाथ और पैर गंवा देने वाले महंत त्रिलोकदास ने हौसला नहीं खोया। मां नर्मदा के प्रति भक्ति ऐसी कि कार से परिक्रमा पर निकल पड़े। महज सात दिन में 4500 किमी की यात्रा करके अपनी पांचवीं नर्मदा परिक्रमा पूरी कर ली। अभी वाहन से पांच और एक पदयात्रा का उनका संकल्प है।
महंत त्रिलोकदास कहते हैं कि उनकी कोशिश उन दिव्यांगों को प्रेरित करने की है, जो भाग्य का लिखा मानकर बैठ जाते हैं। यह कोशिश भी है कि समाज उन जैसे लोगों के प्रति सकारात्मक भाव रखे। इसीलिए जीवन को सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। उन्होंने बताया कि कार से नर्मदा परिक्रमा 23 नवंबर को शुरू की थी। एक पैर और हाथ से वाहन चलाना चुनौती पूर्ण तो होता है, पर उन्हें इसकी आदत पड़ गई है। रास्ते में कहीं रुकते हैं, तो आस-पास मौजूद लोगों का भाव देखकर ही उन्हें दिव्यांग होने का आभास होता है। बाकी उनमें ऊर्जा सामान्य इंसान जैसी ही रहती है।
अक्षमता में देखते हैं सक्षमता
ग्वारीघाट स्थित मोहनधाम के उदासीन संत त्रिलोकदास महाराज ने बताया एक रेल दुर्घटना में उनका दायां हाथ व पैर कट गए थे। पहले तो जीवन खत्म लगने लगा, लेकिन उनके गुरु ने हौसला बढ़ाया और जीने की प्रेरणा दी। इसके बाद हर वो काम करने लगे जो सामान्य व्यक्ति करता है। अपनी अक्षमता को सक्षमता में बदल दिया। 2020 में 11 बार नर्मदा परिक्रमा करने का संकल्प लिया और कार से निकल पड़ा। उसी हौसले से पांचवीं परिक्रमा पूरी कर ली।
चलाते हैं मैन्युअल ट्रांसमिशन कार
महंत ने बताया उनकी कार मैन्युअल ट्रांसमिशन है। बांये हाथ व पैर से इसे चलाते हैं। 4500 किमी की यात्रा में कहीं पर भी उन्हें समस्या नहीं हुई। वे बताते हैं कि हर परिक्रमा को तय करने के समय में कटौती की। यही वजह है कि 15 दिन में पूरी हुई पहली यात्रा इस बार 7 दिन में ही तय हो गई।
11वीं परिक्रमा पैदल करने का लिया है प्रण
महंत ने परिक्रमा के विषय में बताया कि दो संदेश को लेकर चलते हैं। एक स्वयं को समझना, फिर चाहे भगवान ने जिस परिस्थिति में आपको रखा हो। दूसरा मां नर्मदा के निर्मल रखना है, आस्था और अंधविश्वास में इसके आंचल को मैला होने से बचाना है। इन उद्देश्यों के साथ मेरी हर परिक्रमा पूरी होती है। महंत ने बताया कि 11वीं यात्रा वे पैदल पूरी करेंगे।
Published on:
09 Dec 2022 11:50 am

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