
आज फिल्मकार असित सेन की बरसी पर विशेष, जीवन से भरपूर सिनेमा
दिनेश ठाकुर
बांग्ला साहित्य ने अगर हिन्दी सिनेमा को कहानियों के मामले में समृद्ध किया तो बांग्ला फिल्मकारों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे सिनेमा को यथार्थवादी बनाकर आम जिंदगी के करीब ले आए। किसी जमाने में (आजादी से पहले) कोलकाता को भारतीय सिनेमा का मक्का माना जाता था, क्योंकि ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी, रॉयल बाइस्कोप, न्यू थिएटर्स जैसी बड़ी निर्माण संस्थाएं वहां सक्रिय थीं। असित सेन तब न्यू थिएटर्स के फिल्मकार बिमल राय के सहायक हुआ करते थे। नाम को लेकर अगर भ्रम हो तो दूर कर लिया जाए कि फिल्मों में एक और असित सेन ( Asit Sen ) हुआ करते थे, जो हास्य अभिनेता थे और खास ढंग से संवादों को खींचकर बोलने के लिए जाने जाते थे। आजादी के बाद बिमल रॉय ( Bimal Roy ) के साथ उनकी टीम, जिसमें फिल्मकार असित सेन, हृषिकेश मुखर्जी ( Hrishikesh Mukherjee ), कमल बोस ( Kamal Bose ), नबेंदु घोष और संगीतकार सलिल चौधरी शामिल थे, मुम्बई आ गई।
हृषिकेश मुखर्जी की तरह असित सेन का सिनेमा भी भावनाओं और संवेदनाओं का सिनेमा है। वे अपनी फिल्मों में गीत-संगीत को इस तरह बुनते थे कि कहानी का हिस्सा बन जाता था। उनकी 'सफर' (राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर) का जिक्र होता है तो 'जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर' या 'हम थे जिनके सहारे' या 'जीवन से भरी तेरी आंखें' बरबस याद आ जाते हैं। 'खामोशी' (वहीदा रहमान, राजेश खन्ना) की बात चलेगी तो 'वो शाम कुछ अजीब थी', 'तुम पुकार लो' और 'हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू' जरूर याद आएंगे। उनकी 'ममता' (सुचित्रा सेन, धर्मेंद्र) की कहानी भले लोगों ने बिसरा दी हो, 'रहें न रहें हम महका करेंगे', 'छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा कि जैसे मंदिर में लौ दीये की' और 'रहते थे कभी जिनके दिल में' को भुलाना मुश्किल है। यही मामला 'अनोखी रात' (संजीव कुमार, जाहिदा) के 'ओह रे ताल मिले नदी के जल में', 'महलों का राजा मिला' और 'मिले न फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली' के साथ है। फिल्म का नाम लो तो गीत गुनगुनाहट बनकर होठों पर आते हैं।
निर्देशक असित सेन को बांग्ला फिल्म 'उत्तर फाल्गुनी' ('ममता' इसी का रीमेक थी) के लिए नेशनल अवॉर्ड और 'सफर' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया। उनकी 'खामोशी' मार्मिक कविता जैसी फिल्म है, जिसमें नायिका के त्याग, शालीनता और गरिमा को गहरे आयाम के साथ पेश किया गया। असित सेन की दूसरी उल्लेखनीय फिल्मों में 'परिवार', 'शराफत', 'बैराग' (इसमें दिलीप कुमार के तीन किरदार थे) और 'अन्नदाता' शामिल हैं। कोलकाता में 25 अगस्त, 2001 को जिंदगी का सफर थमने से काफी पहले वे फिल्मों से अलग हो गए थे।
Published on:
24 Aug 2020 11:55 pm
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