
तीन देशों के प्रधानमंत्री कनाडा के मार्क कार्नी, ब्रिटेन के कीर स्टारमर और ऑस्ट्रेलिया के एंथनी अल्बानीज़। ( फ़ाइल फ़ोटो: एएनआई)
Palestine state recognition: ब्रिटेन, कनाडा और आस्ट्रेलिया समेत कुल 176 देशों ने आधिकारिक तौर पर फिलिस्तीन (Palestine state recognition) को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी है। यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब मध्य पूर्व में शांति की संभावना पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। ब्रिटेन(UK Palestine support) के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि यह मान्यता दो राष्ट्रों के बीच स्थायी शांति का रास्ता खोल सकती है। ब्रिटेन का यह कदम कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य देशों के साथ मेल खाता है, जिन्होंने पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता (Independent Palestine 2025) दी है। ब्रिटेन ने यह बात साफ की है कि फिलिस्तीन को मान्यता देने का मतलब हमास को समर्थन देना नहीं है। हमास पर प्रतिबंध जारी रहेगा। यह कदम इजराइल और अमेरिका की आलोचना के बीच आया है। दोनों देशों ने इसे आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला बताया, जबकि ब्रिटेन ने इसे स्थायी शांति की ओर एक सकारात्मक कदम बताया है। उधर फिलिस्तीन (Global support for Palestine) को मान्यता मिलने से ICC (अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय) में इजराइल पर केस दर्ज करने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
ब्रिटेन से पहले मई 2024 में नॉर्वे, आयरलैंड और स्पेन ने भी फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दी थी। इन देशों ने कहा था कि यह मान्यता मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इजरायल ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और इन देशों से अपने राजदूत वापस बुला लिए।
फिलिस्तीन में विश्व के अधिकतर देशों का लगभग 76% हिस्सा बनता है। हालांकि, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों ने फिलिस्तीन को पूर्ण मान्यता नहीं दी है, फिर भी इस कदम से फिलिस्तीन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता और स्थिति मजबूत हुई है।
यह कूटनीतिक सफलता फिलिस्तीन के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता और शांति के लिए अभी भी कई मुश्किलें हैं। क्षेत्रीय संघर्ष और राजनीतिक मतभेद फिलिस्तीन के भविष्य के रास्ते में बड़ी बाधाएं बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब मिलकर काम करना होगा ताकि इजराइल-फिलिस्तीन विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सके।
इजराइल ने इस फैसले की तीखी आलोचना की और इन देशों से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया।
अमेरिका ने फिलहाल इस कदम से दूरी बनाते हुए कहा कि बातचीत के जरिए समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए।
अरब लीग और कई मुस्लिम देशों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
आने वाले हफ्तों में यह देखा जाएगा कि अन्य यूरोपीय देश भी इस कदम का अनुसरण करते हैं या नहीं।
इजराइल और फिलिस्तीन के बीच मध्यस्थता की कोशिशें बढ़ सकती हैं, जिसमें अमेरिका, कतर या यूएन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
यूनाइटेड नेशंस जनरल असेम्बली (UNGA) में फिलिस्तीन की स्थायी सदस्यता को लेकर नए सिरे से बहस हो सकती है।
यह भी संभव है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में इजरायल की नीतियों को लेकर कानूनी दबाव बढ़े।
भारत फिलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक रूप से सहानुभूति रखता आया है, लेकिन हाल के बरसों में इजराइल के साथ रिश्तों में भी मजबूती आई है। ऐसे में भारत की राजनयिक रणनीति देखने लायक होगी। टिकटॉक विवाद और अमेरिका-चीन तनाव के बीच यह मान्यता, पश्चिमी देशों की मध्य पूर्व नीति फिर से परिभाषित करने का संकेत हो सकती है।
बहरहाल फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले देशों की संख्या बढ़ने से क्षेत्र में शांति की आशाएं बढ़ी हैं। हालांकि, इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आएं और विवादों का समाधान निकालें। फिलहाल यह मान्यता फिलिस्तीन को कूटनीतिक ताकत देती है और उसकी स्थिति को मजबूत बनाती है। (इनपुट : एएनआई)
Published on:
21 Sept 2025 08:26 pm
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