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मिर्जापुर कईला गुलजार हो,कचौड़ी गली सून कईला बलमू 

मिर्जापुर कईला गुलजार हो,कचौड़ी गली सून कईला बलमू 

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Awesh Tiwary

Jul 10, 2017

kajri, mirzapur, mirjapur, folk songs, varanasi

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आवेश तिवारी
वाराणसी। सुन्दर' हाँ यही नाम था उसका । सुन्दर मिर्जापुर के पक्के मोहाल की तवायफ थी लेकिन पड़ गई बनारस के मशहूर गुंडे और रंगबाज नागर के प्रेम में। लोग प्रेम में ग़जलें गाया करते हैं लेकिन वो आजादी के तराने गाने लगी। अंग्रेज सेना के छक्के छुड़ा देने वाले नागर को एक दिन मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया गया था जब वो अकेले निहत्था कटेसर की ओर जा रहा था। नागर को कालेपानी की सजा हो गई।कहा जाता है कि नागर की गिरफ्तारी के बाद सुन्दर पागल हो गई थी और दिन रात नारघाट की सीढियों पर बैठ कर वो कजली गाती रहती थी। 'सुन्दर' ने न जाने कितने सावन नागर का इन्तजार किया मगर वो नहीं आया और एक दिन सुन्दर ने उन्ही सीढियों पर दम तोड़ दिया ,सुन्दर जो कजली गाती थी उसके बोले कुछ ऐसे थे
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला काले पनियाँ रे हरी
खुंटिया पे रोवे नागर ढाल तरवरिया रामा
कोनका में रोवे कडाबिनियाँ रे
हरी घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियाँ रामा
से जिया पैरोवे बारी धनिया रे हरी।

न वो दिन रहे न अखाड़े
मिर्जापुर के संग मुहाल इलाके में 'लतरानी का अखाड़ा' अब केवल एक नाम भर है कभी यहाँ पूरे सावन मेले सा माहौल होता था। कजरी का दंगल सारी–सारी रात हुआ करते , एक से बढ़कर एक अखाड़े, जिसने सुनने वालों को बाँध लिया वो जीत गया।”अपने सुनहरे बालों पर रखे पल्ले को संभालती वो पूराने दिनों में डूब जाती हैं-“सावन चला जाता था, मगर कजरी होठों पर मौजूद रहती थी.”मगर अब समय बदल गया, अखाड़े नहीं रहे., चबूतरों पर दुकानें उग आई है,. गलियां अब भी भीगती हैं लेकिन कजरी की जगह फ़िल्मी गानों ने ले ली है। सिनेमा और सस्ते एल्बमों में गाने वाले न तो उसकी प्रस्तुतीकरण से जुडी तकनीक को समझ पाते हैं न तो अपनी गायकी से कजरी का रस पैदा कर पाते हैं। हाँ, सावन शुरू होते ही मंगल उत्सवों में शहनाई बजाकर किसी तरह अपना पेट पालने वालों ने अब तक कजरी को जैसे-तैसे जिन्दा कर रखा है।सुनिये गिरिजा देवी की आवाज मे यह कजरी -

अखाड़ों की जंग में संगीत का रंग
सोनभद्र और मिर्जापुर में नागपंचमी के दिन लड़कियां मिटटी में जौ बोती हैं तथा समय समय पर सींचती हैं जिसके कारण उसमे अंकुर निकल आता है और बालियाँ निकल आती है। कजरी के दिन उन बालियों को लडकियां भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखती हैं तथा अपने नेग लेती हैं. इस नेग को जरी खोसाई कहा जाता है। अजय शेखर बताते हैं कि कजरी गायकों के अखाड़े में पततु के अखाड़े का बहुत सम्मान था, विख्यात लोकगायक बुल्लू और शीतला प्रसाद पांडे भी इसी अखाड़े के थे।सोनभद्र में कल्लू के अखाड़े का बहुत सम्मान था। कजरी गायक अपने गायन से समाज में ऐसी चेतना जागृत करना चाहते थे कि तमाम सामाजिक बुराइयां, दहेज आदि बंद हो। वे याद करते हुए मुस्कुराते हैं –“ जब शीतला प्रसाद गाते थे, उनके एक हाथ में झांझ रहता था और दूसरा हाथ खाली रहता था, जिससे वो श्रोताओं को इंगित करते थे। अजय शेखर मानते हैं कि गाँवों का शहर की ओर पलायन कजरी के लुप्त होने की बड़ी वजह है। लोक गीत परम्पराओं में शामिल रहते हैं, जब परम्पराएं सुरक्षित नहीं रहेंगी तो गीत भी नहीं रहेंगे। वे कहते हैं- “एक वक्त था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम गीतकार और कवि बकायदे कजरी लिखा करते थे, अब कजरी लिखने वाले भी नहीं रहे. न उसे सुनने वाले रहे।लिजिये गोरखपुर की कजरी सुनिये


न गायक बढे न कजरी

मिर्जापुरी कजरी लोकगायन की एक ऐसी अदभुत शैली थी, जिसका यौवन सैकड़ों वर्षों तक बना रहा।लेकिन अफसोस, आजादी के बाद धीमे-धीमे इसका बुढापा आ गया और अब ये मृत्युशैया पर पड़ी है।उस्ताद बिस्मिल्ला कहा करते थे- अगर कजरी को आगे बढ़ाना हो तो उनको गाने वालों को आगे बढाओ. लेकिन उनकी बात अनसुनी रह गई। न गायक आगे बढे न कजरी. उप शास्त्रीय गायकों ने भी इसके साथ कभी न्याय नहीं किया। सिर्फ उन्ही लोगों ने इसे देश विदेश में गाया, जो खुद पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे.–कजरी मुख्य तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, बनारस और गोरखपुर अदि जनपदों में गायी जाती रही है. सावन में गाये जाने वाली कजरी सिर्फ सिर्फ श्रृंगार या प्रेम का गीत नहीं है. इसमें राष्ट्रप्रेम, लोक-चिंतन के साथ साथ प्रकृति प्रेम भी सुनने को मिलता है. एक कजरी जो आज भी बनारस और मिर्जापुर के बच्चों-बच्चों की जुबान पर है, जिसे उस वक्त लिखा गया था जब धनिया नाम की किसी कजरी गायिका का प्रेमी, आजादी की जंग के दौरान रंगून चला गया था पर लौट कर नहीं आया-
मिर्जापुर कइलन गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कईले बलमू/ एही मिर्जापुर से उडले जहजवा, सैयां चल गईले रंगून हो/ कचौड़ी गली.......

गुम हो गई धुनमुनिया

मिर्जापुर में गाये जाने वाली कजरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी मिठास है। जिसमें न सिर्फ प्रेमी-प्रेमिकाओं की संवेदनाएं देखने को मिलती हैं बल्कि इनमे ननद-भाभी के संबंधों का खूबसूरत ताना-बाना तो कभी सहेलियों के बीच झूलों पर हो रही हंसी-ठिठोली भी सुनने को मिलती है। कजरी की एक बेहद विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ थी, जिसमें महिलायें एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल घेरा बनाकर कजरी गाती थी, मगर अब ये कहीं नजर नहीं आती। हालांकि इन सब की अनुपस्थिति के बाद भी आज इसकी विविधता की वजह से ही ज्यादातर मंचीय गायक इसे ही गाना पसंद करते हैं-
पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया/ रंग रहे कपूरी पिया ना/ जबसे साड़ी ना लिअईबा/ तबसे जेवना ना बनईबे/ तोरे जेवना पे लगिह मजूरी पिया/ रंग रहे कपूरी पिया ना.

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से
कजरी का प्रेम से सीधा नाता है, ये कभी विरह में आत्मभिव्यक्ति का माध्यम बनता है तो कभी प्रेमरस बरसाते हुए सब कुछ भिगो डालता है। विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है। फिर यही तो समय होता है इतराने का, फरमाइशें पूरी करवाने का -
पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से/ जायके साइकील से ना/ पिया मेंहदी लिअहिया/ छोटकी ननदी से पिसईहा/ अपने हाथ से लगाय दा/ कांटा-कील से/ जायके साइकील से।