मिर्जापुर के संग मुहाल इलाके में 'लतरानी का अखाड़ा' अब केवल एक नाम भर है कभी यहाँ पूरे सावन मेले सा माहौल होता था। कजरी का दंगल सारी–सारी रात हुआ करते , एक से बढ़कर एक अखाड़े, जिसने सुनने वालों को बाँध लिया वो जीत गया।”अपने सुनहरे बालों पर रखे पल्ले को संभालती वो पूराने दिनों में डूब जाती हैं-“सावन चला जाता था, मगर कजरी होठों पर मौजूद रहती थी.”मगर अब समय बदल गया, अखाड़े नहीं रहे., चबूतरों पर दुकानें उग आई है,. गलियां अब भी भीगती हैं लेकिन कजरी की जगह फ़िल्मी गानों ने ले ली है। सिनेमा और सस्ते एल्बमों में गाने वाले न तो उसकी प्रस्तुतीकरण से जुडी तकनीक को समझ पाते हैं न तो अपनी गायकी से कजरी का रस पैदा कर पाते हैं। हाँ, सावन शुरू होते ही मंगल उत्सवों में शहनाई बजाकर किसी तरह अपना पेट पालने वालों ने अब तक कजरी को जैसे-तैसे जिन्दा कर रखा है।सुनिये गिरिजा देवी की आवाज मे यह कजरी -