टोंक. जिला मुख्यालय पर स्थित प्राचीन कंकाली माता का मंदिर न सिर्फ टोंक बल्कि राज्य के लोगों की आस्था का केंद्र है, लेकिन नवरात्रों के दौरान देर रात तक मंदिर में भक्तों की भीड़ अधिक रहती है।श्री कंकाली माता की प्रतिमा एवं स्थापना के सम्बंध में कहा जाता है कि पूर्व में यह रसिया की छतरी की तलहटी में पहाडों के बीच स्थापित थी।
बताया जाता है कि लगभग 300 वर्ष पूर्व लोगों के सहयोग से तत्कालीन नवाब रियायत काल में माता की मूर्ति को पहाड़ी से नीचे लाया गया। जहां पर नवाब द्वारा मंदिर के लिए आठ बीघा जमीन दी गई थी, जो आज भी मंदिर के नाम है।
इतना ही नहीं नवाब द्वारा मंदिर के लिए प्रतिदिन भोग प्रसाद की व्यव्स्था के लिए चिराग के नाम से राशि भी जारी की थी। मन्दिर के महंत दुर्गालाल गोस्वामी का कहना है कि उनके पिता स्वर्गीय श्रीलाल पूरी के पहले कंकाली माता की सेवा नागा सेवादार ही किया करते थे।
उन्होंने बताया कि कंकाली माता की प्रतिमा शुरुआत में तत्कालीन मन्दिर में कोल्हू के कमरे में ही विराजमान थी बाद में वर्तमान में मन्दिर स्थापित है।महंत दुर्गालाल गोस्वामी ने बताया कि कंकाली माता की प्रतिमा के साथ बिजासन, पार्वती, चामुंडा सहित अपनी पांच बहनों के साथ विराजमान है।
उन्होंने बताया कि मंदिर में वर्ष 1962 में नवकुण्डिय श्री महायज्ञ भी हुआ था। दुर्गालाल गोस्वामी ने बताया कि कंकाली माता के मंदिर की सेवा का जिम्मा आज ग्यारहवी पीढ़ी के है।