
प्रदीप मिश्रा. सूरत.
सूरत का कपड़ा उद्योग एक ओर नई ऊंचाइयों को छू रहा है तो दूसरी ओर श्रमिकों के गहराते संकट ने कपड़ा उद्यमियों की नींद उड़़ा दी है। साउथ गुजरात टैक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने इस संकट का सामना करने के लिए रोजगार कार्यालय से मदद की गुहार लगाई है। यदि सब कुछ अपेक्षा के अनुसार हुआ तो कपड़ा उद्योग में श्रमिकों का संकट कम हो जाएगा।
सूरत में कपड़ा उद्योग का दायरा बहुत बड़ा है। साउथ गुजरात में लगभग 400 डाइंग-प्रोसेसिंग यूनिट, सात लाख लूम्स मशीन, एक लाख एम्ब्रॉयडरी मशीन हैं। सब मिलाकर लगभग आठ से 10 लाख लोगों को इससे रोजगार मिलता है। कुछ वर्ष पहले तक यूपी, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि राज्यों के लोग यहां आते थे और लूम्स मशीन व डाइंग-प्रोसेसिंग का काम सीखते थे। पिछले पांच वर्षों में इसमें बड़ा बदलाव आया है।
उद्यमी बताते हैं कि नई युवा पीढ़ी के लड़के कपड़ा उद्योग में आने से कतराते हैं। इसकी जगह वह घर में रहकर ही मोबाइल या छोटी सी दुकान खोलना पसंद कर रहे हैं। काम के लिए उन्हें सूरत आना मंजूर नहीं। दूसरी ओर गांवों में नरेगा योजना सहित रोजगार के अन्य विकल्पों के कारण जो लोग सूरत में रहकर काम कर रहे हैं, वे भी वापस जाने लगे हैं। इस कारण कपड़ा उद्योग में हर साल पांच प्रतिशत श्रमिक घट रहे हैं।
परिणाम यह है कपड़ा उद्योग के लिए श्रमिकों की कमी स्थाई समस्या बन गई है। लग्नसरा और दिवाली के दिनों में अन्य प्रांतों से आए श्रमिक अपने घर चले जाते हैं तब कपड़ों का उत्पादन पचास प्रतिशत घट जाता है। ऐसी स्थिति में कई बार तो ऑर्डर रद्द करने तक की नौबत आ जाती है। इस कारण कपड़ा उद्यमियों को उद्योग का भविष्य संकट में नजर आने लगा है।
इससे पार पाने के लिए साउथ गुजरात टैक्सटाइल प्रोसेसिंग एसोसिएशन ने रोजगार कार्यालय से बातचीत शुरू की है। एसोसिएशन के प्रमुख जीतू वखारिया ने बताया कि रोजगार कार्यालय के उच्च अधिकारी से इस सिलसिले में बात हुई है। वहां पंजीकृत लोगों को कपड़ा उद्योग से जोडऩे का प्रयास किया जाएगा। यदि वह चाहेंगे तो उन्हें स्टाइपंड के साथ प्रशिक्षित कर नौकरी की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा प्रोसेसर्स एसोसिएशन कपड़ा उद्योग के लिए एक सिलेबस पर भी विचार कर रहा है। इसके लिए केन्द्र सरकार से संवाद किया जाएगा।
नई टैक्नोलॉजी है विकल्प
कपड़ा उद्यमियों का मानना है कि इस समस्या के लिए रेपियर, वाटरजेट, एयरजेट सहित नई टैक्नोलॉजी वाली मशीनें एक विकल्प है। उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी चाहिए। फिलहाल कपड़ा उद्योग में प्रशिक्षित श्रमिकों का भी अभाव है। इसलिए यह विकल्प भी सफल नहीं है।
शिक्षा बढऩे के कारण हुई कमी
नई पीढी के युवा पढाई करने के बाद आईटी सेक्टर या अन्य उद्योग में जाना पसंद कर रहे हैं। वह सूरत के कपड़ा उद्योग में 12 घंटे नौकरी करना नहीं चाहते। इस समस्या के लिए कपड़ा उद्यमियों को टैक्नोलॉजी की ओर जाना पड़ेगा।
भरत गंाधी, चेयरमैन, फेडरेशन ऑफ इंडियन आर्ट सिल्क वीविंग इन्डस्ट्री
Published on:
07 Mar 2018 01:00 am
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