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“दिल्ली आवाज लगा रही है कि दुनिया का नक्शा बदलेगा”

शहर से सटे चक 23 पीएस निवासी 88 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी मोहनसिंह स्वतंत्रता संग्राम की बातें ऎसे बताते हैं जैसे कल की ही बात हो

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Shankar Sharma

Aug 11, 2015

 Ganganagar photo

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महेन्द्र वर्मा

रायसिंहनगर। शहर से सटे चक 23 पीएस निवासी 88 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी
मोहनसिंह स्वतंत्रता संग्राम की बातें ऎसे बताते हैं जैसे कल की ही बात हो। वे कहते
हैं कि तिरंगा उस समय आजादी की लड़ाई का बड़ा हथियार था। राष्ट्रीय ध्वज हाथ में
आते ही अंग्रेजों की लाठियों और गोलियों से सामना करने का जोश कई गुणा बढ़ जाता था।


उस समय 18 साल का था और आजादी की लड़ाई के लिए जलसे आयोजित करने वाली युवा
टीम में शामिल था। वर्ष 1946 में पंवारसर (रायसिंहनगर का पुराना नाम) में बड़ा जलसा
रखा गया तो अंग्रेजी प्रशासन ने अनुमति नहीं दी। आक्रोश बढ़ा तो तिरंगा नहीं फहराने
की शर्त पर मंजूरी मिली। तय दिन सैकड़ों लोग जलसे में शामिल हुए लेकिन आजादी की
लड़ाई के लिए हमारी युवा टीम ने तिरंगा लहरा दिया। फिर क्या था लाठियां बरसने लगी।
हालात और बिगड़े तो फायरिंग की गई। ऎसे में हमारे साथी बीरबल शहीद हो गए और मेरे
सहित कई साथी घायल हो गए। वे कहते हैं आज भी वह पूरा परिदृश्य मेरी आंखों के सामने
घूमने लगता है।


पैर में फैक्चर होने से स्वतंत्रता सेनानी मोहन सिंह वाकर की
मदद से चल पाते हैं। स्वतंत्रता संग्राम की बातचीत चलने पर बताने लगे कि उस समय एक
जोशीला नारा "दिल्ली आवाज लगा रही है कि दुनिया का नक्शा बदलेगा" खूब लगाया जाता
था। बीकानेर रियासत पर महाराजा सर्दूलसिंह का राज था। प्रजा परिष्ाद के बैनर तले
1946 में कुम्भाराम आर्य का यहां जलसा रखा गया था। फायरिंग में बीरबल के शहीद होने
के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ने लगे। उन्हें (मोहनसिंह) व घायल साथियों को गिरफ्तार
कर बीकानेर चिकित्सालय ले जाया गया। वहां एक देशभक्त चिकित्सक ने उनकी खूब मदद की।
बाद में उन्हें जेल में बंद कर दिया गया।

नेहरू ने दिलवाई जमानत : स्वतंत्रता
सैनानी मोहनसिंह बताते है कि पंडित नेहरू को जानकारी मिली तो उन्हाेंने हम सब
साथियों की रिहाई के लिए लिखित आग्रह किया। बीस दिन बाद नेहरू के आग्रह पर जेल से
रिहा कर दिया गया। इसके बाद भी संघष्ाü चलता रहा लेकिन जब 15 अगस्त 1947 को देश
आजाद होने की घोष्ाणा हुई तो संघष्ाü के दौरान झेली सारी प्रताड़ना भूल गए। वह क्षण
ऎतिहासिक था जब हम अपने कितने ही साथियों को खो देने के बाद अपनी आंखों से अपने वतन
को आजाद होते देख रहे थे।

परेशान हुए तो लिखा खुला पत्र
एक बार पंडित
नेहरू व इंदिरा गांधी सूरतगढ आए तो स्वयं मोहनसिंह ने खुला पत्र उनके नाम छपवाकर
उनकी तरफ मंच पर फेंका। इंदिरा जी ने पत्र को पढ़ा जिसकी बदौलत उनकी पेंशन तो बंध
गई लेकिन स्वतंत्रता सैनानियों को मिलने वाली जमीन का आज भी इंतजार है।