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जानिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सूत्रधार रानी अवंती बाई के लिए भी क्यों लगी फटकार

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सूत्रधारों में से एक रहीं वीरांगना रानी अवंती बाई को लेकर रायसेन नगर पालिका का लचर रुख मध्यप्रदेश हाइकोर्ट की फटकार का बड़ा कारण बन गया। 1857 की क्रांति में रेवांचल में मुक्ति आंदोलन की सूत्रधार रहीं सिवनी जिले के रामगढ़ की रानी अवंती बाई मध्यप्रदेश में सम्मानीय है, पर नगर पालिका रायसेन उनकी प्रतिमा ऐसे स्थान पर लगाना चाहता था, जहां प्रतिमा लगने के बाद आम लोगों के आवागमन की राह में बड़ी बाधा खड़ी हो जाती। यह स्थान वहां का कामधेनु मार्केट है।

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Statue of Rani Avanti Bai based at Dindori

डिंडोरी के रामगढ़ स्थित रानी अवंती बाई की प्रतिमा। ऐसी ही प्रतिमा रायसेन की नगर पालिका वहां के कामधेनु मार्केट में लगाने की कोशिश में थी, जिसके लिए उसेे हाइकोर्ट की फटकार लगी है।

प्रसंगवश
राजेंद्र गहरवार
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सूत्रधारों में से एक रहीं वीरांगना रानी अवंती बाई को लेकर रायसेन नगर पालिका का लचर रुख मध्यप्रदेश हाइकोर्ट की फटकार का बड़ा कारण बन गया। 1857 की क्रांति में रेवांचल में मुक्ति आंदोलन की सूत्रधार रहीं सिवनी जिले के रामगढ़ की रानी अवंती बाई मध्यप्रदेश में सम्मानीय है, पर नगर पालिका रायसेन उनकी प्रतिमा ऐसे स्थान पर लगाना चाहता था, जहां प्रतिमा लगने के बाद आम लोगों के आवागमन की राह में बड़ी बाधा खड़ी हो जाती। यह स्थान वहां का कामधेनु मार्केट है। न्यायालय पालिका को इस बारे में पहले टोक चुका था। इसके बावजूद पालिका जब इसके लिए रास्ते तलाशने में जुटा रहा, तब हाइकोर्ट ने उसे फटकार लगा दी।
इसका कारण साफ है कि सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2013 में यह व्यवस्था दे चुका है कि प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थान पर नहीं लगाई जाएं, जहां वे लोगों के लिए बाधक बनें। उलटे सुप्रीम कोर्ट तो ऐसे स्थानों पर पहले से लग चुकी प्रतिमाओं को हटाने तक का आदेश दे चुका है। इसके बावजूद रायसेन में ऐसी कोशिश जारी रहने से हाइकोर्ट का नाराज होना स्वाभाविक था। इससे न सिर्फ रायसेन वरन मध्यप्रदेश के सभी निकायों व सरकार को सबक ले लेना चाहिए।
देश के चौराहों व दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमाएं लगाने का चलन तेजी से बढ़ा है। अधिकांश संदर्भों में यह विशुद्ध रूप से राजनीतिक और तुष्टिकरण का मामला होता है। ऐसे निर्णय के पीछे महज सियासी नफा-नुकसान का ही गणित होता है। न तो इसका अधिक संबंध विचारधारा से होता है और न ही जिसकी प्रतिमा लगाई जाती है, उसके सदगुणों को अपनाने की किसी तरह की इच्छाशक्ति से। दलों की विचारधारा के अनुसार प्रतिमाएं लगाई जाती हैं। एक बार अनावरण हुआ तो जल्दी ही इसके बाद सभी भूल जाते हैं। जयंती या पुण्यतिथि पर ही हस्तियां याद की जाती हैं, लेकिन इसके अलावा पूरे साल भर इन पर गर्द जमती रहती है और पक्षी अपनी शरणस्थली बना लेते हैं। इन स्थितियों को देखते हुए कोर्ट की फटकार गौर करने लायक हैं।
प्रतिमाओं के संबंध में यह तीसरा मौका है जब कोर्ट के आदेश ने प्रतिमाओं की राजनीति को आइना दिखाया है। इससे पहले भोपाल में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की प्रतिमा लगाने को लेकर सरकार के तर्क कोर्ट में नहीं टिके थे। तब भी राजनीति पर सवाल उठे थे। अब नया मामला रायसेन जिले का तो ज्यादा गंभीर है। इसमें नगरपालिका कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद प्रतिमा लगाने पर आमादा थी। इस पर हाइकोर्ट की तल्खी ने राजनीतिक फैसले पर सवाल खड़ा किया है।

हाइकोर्ट की टिप्पणी खासी गौर करने लायक है। लेकिन राजनीतिक दल इससे सबक लेंगे, ऐसी उम्मीद कम ही है। उन्हें प्रतिमाओं के जरिए निष्ठा और हस्तियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के अभिनय का मौका जो मिलता है। आलम यह है कि रोड कांग्रेस के नियमों में सडक़ों और चौराहों पर रोटरी बनाने और प्रतिमाएं स्थापित किए जाने के कड़े मापदंड बनाए गए हैं। उस मार्ग के यातायात की स्थिति और कार यात्री अनुपात की गणना की जाती है। उसी आधार पर जगह का निर्धारण होता है। लेकिन जब फैसले राजनीतिक हों तो फिर नियम कायदों की क्या बिसात? यह चलन सरकार के ऊपरी स्तर भर पर ही नहीं, बल्कि स्थानीय निकायों तक पहुंच गया है। संबंधित निकाय व सरकारी संस्थाएं भी ऐसे मनमाने फैसले लेकर बड़ी बाधा उत्पन्न करते हैं। सरकार को चाहिए कि वह हाइकोर्ट की टिप्पणी से भी सबक लेकर प्रतिमाओं को लगाने के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करे। इनमें प्रतिमाएं लगाने के अधिकार बिलकुल दिए जाएं, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाए कि जनता को तकलीफ न हो।