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photo story:जानिए क्यों ढूंढोत्सव मनाया जाता है

- सजने लगा बाजार

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आबूरोड. रंगों के पर्व होली में अब महज छह दिन बाकी हैं। शहर में दीपावली के बाद शहर के बाजारों की रौनक फिर से लौट आई है। यहां ढूंढ़ परम्परा को लेकर शहर में उत्साह का माहौल है। बाजार ढूंढ़ परम्परा पर होने वाली खरीद को लेकर पूरी तरह सजकर तैयार है। बाजार में मिठाई, बच्चों के कपड़ों व खिलौनें, विभिन्न प्रकार के ढूंढ के जोड़े, रंग-बिरंगे साफे व जूतियां की खरीद गति पकडऩे लगी है। शहर समेत आस-पास के लोगों की भीड़ भी आने लगी है, गुरुवार को आबूरोड में भरे जााने वाले १४ तारीख के मेले में आदिवासी क्षेत्र के लोगों ने काफी खरीदारी की।
धूलंडी के दिन निर्वहन होगी परम्परा
परम्परा के अनुसार ढूंढ़ कई स्थानों पर अलग अलग समय पर होती हैं, हालांकि होलिका दहन के बाद ही नवजात बच्चों को ढूंढने की रस्म अदा होती है। धुलंडी के दिन वर्ष भर में जन्मे बच्चों की ढूंढ की परम्परा के निर्वहन के साथ ही स्वस्थ जीवन की कामना की जाती है। इससे पूर्व कई कार्यक्रम होते हैं। रात को सांजी (मंगल गीत) की गूंज सुनाई देने लगी है। नवविवाहित होलिका दहन स्थल के फेरे लगाएंगे। जिनके घर में ढंूढोत्सव है वहां पर बड़े भोज का भी आयोजन होगा। बच्चे के ननिहाल वाले पहली बार कपड़े व आभूषण लेकर आएंगे। पर्व को लेकर महिलाओं ने घरों की सफाई भी शुरू कर दी है।
डंडे से शिशु के आरोग्य कामना
जानकारी के के अनुसार प्राचीन काल में पिंगलासुर नाम का राक्षस था, जो नवजात शिशुओं को खा जाता था। रक्षा के लिए गांव के लोग लट्ट लेकर खड़े होने लगे। बाद में यह परम्परा ढूंढोत्सव के रूप में मनाई जाने लगी, जिसमें लट्ट का प्रतीकात्मक डंडा लेकर शिशु के आरोग्य व आयु वृद्धि की कामना की जाती है।