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इस मंदिर में एक गलती से चले जाते हैं प्राण, फिर भी देश-दुनिया से आते है लाखों भक्त

इस मंदिर में एक गलती से चले जाते हैं प्राण, फिर भी देश-दुनियां से आतें है लाखों भक्त

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maihar devi how to reach maihar me kitni sidhi hai

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सतना। हम हमेशा से ही सुनते आए हैं की भगवान में श्रद्धा हो तो और उनका आशीर्वाद हो तो मरते हुए व्यक्ति को भी जीवनदान मिल जाता है। दुनियाभर में कई मंदिर है जहां लोग अपनी मनोकामनाओं और मन की शांति के लिए मंदिर जाते हैं। कुछ लोग तो मंदिर प्रांगण में भी रुक जाते हैं। लेकिन आपको जनकर हैरानी होगी की भारत में एक ऐसा मंदिर भी है जहां माता रानी के भक्तों को मंदिर में रुकने की अनुमति नहीं है।

कहा जाता है की रात को जो भी व्यक्ति यहां रुकता है उसको सुबह का सूरज देखना नसीब नहीं होता। जी हां, यह मंदिर है मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर में। इस मंदिर को लेकर लोगों का मनना है की यदि मंदिर में कोई व्यक्ति रात के समय रूकने की कोशिश करता है, तो वह अगली सुबह नहीं देख पाता है। ऊंची पहाड़ी पर होने के बावजूद इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।

आस्था का प्रमुख केंद्र मैहर मंदिर
मैहर में स्थित यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में माता शारदा की पूजा की मुख्य पूजा की जाती है लेकिन इनके साथ-साथ देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, श्री काल भैरवी, भगवान, फूलमति माता, ब्रह्म देव, हनुमान जी और जलापा देवी की भी पूजा होती है। मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर भी कहा जाता है। शारदा मां के दर्शनों के लिए यहां आने वाले भक्तों को 1063 सीढिय़ों का सफर तय करना पड़ता है। कुछ वर्षों से शासन द्वारा रोपवे की भी व्यवस्था बना दी गई है। जहां महज 100 से 110 रुपए देकर मां के आसानी से दर्शन कर सकते है। भक्तों का मानना है की मैहर में मां शारदा में मांगी हर मुराद पुरी होती है। लोग यहां मन्नत के धागे भी बांधते हैं और पूरी होने पर दोबार दर्शन के लिए आते हैं।

आल्हा और ऊदल सबसे पहले करते है पूरा
मंदिर में दर्शन के लिए सालों से आ रहे भक्त बताते हैं की मंदिर में आल्हा और ऊदल आकर सबसे पहले माता शारदा की पूजा और पूरा श्रृंगार करते हैं। इसके बाद ही यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के पट खुलते हैं। यहां के लोगों की मान्यता के अनुसार आल्हा और ऊदल माता के सबसे बड़े भक्त थे। ऐसा कहा जाता है कि इन दोनों के द्वारा ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के मंदिर की खोज की गई थी। फिर आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आज भी यह मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं।

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माई कहकर पुकारता था आल्हा
आल्हा मां को शारदा माई कहकर पुकारता था और इसी वजह से यहां विराजमान मां को शारदा माई कहा जाता है। वहीं इस मंदिर से जुड़ी एक मान्यता ये भी है कि रात को 2 बजे से लेकर 4 बजे तक इस मंदिर में किसी का भी प्रवेश वर्जित है और अगर कोई व्यक्ति इस समय मंदिर में प्रवेश करता है तो उसकी मृत्यु हो जाती हैं। वहीं मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है। तालाब से 2 किलोमीटर आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में ये मान्यता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे। मंदिर के पीछे वाले तालाब को आल्हा तालाब कहा जाता है।

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