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जिन बेटों के लिए पालने में लगाई पूरी जिंदगी, अब उन्हीं ने माता-पिता को वृद्धाआश्रम के सहारे छोड़ा

वल्र्ड एल्डर अब्यूज अवेयरनेस डे पर विशेष  

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सागर

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Reshu Jain

Jun 15, 2019

जिन बेटों के लिए पालने में लगाई पूरी जिंदगी, अब उन्हीं ने माता-पिता को वृद्धाआश्रम के सहारे छोड़ा

जिन बेटों के लिए पालने में लगाई पूरी जिंदगी, अब उन्हीं ने माता-पिता को वृद्धाआश्रम के सहारे छोड़ा

सागर. भारतीय संस्कृती हमें बुजुर्गों का सम्मान सिखाती हैं। बढ़े-बुर्जुग ही हैं जो पेड़ के समान पूरे परिवार को छाया देते हैं। एक हंसता-खेलता परिवार उनके नेतृत्व में ही बनता है। लेकिन वर्तमान में एक ल परिवार की ओर लोग तेजी से बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि जो माता-पिता बच्चों के लिए अपनी पूरी जिंदगी दे देते हैं आज उनके लिए ही परिवार में रहने के लिए जगह नहीं है। वे वृद्धाआश्रम के सहारे दो वक्त की रोटी खाकर अपना पेट भर हैं। ऐसे वृद्धों के लिए दरदर की ठोकरे खाने के लिए उनके बेटों ने ही छा़ेड़ दिया है। आज वल्र्ड एल्डर अब्यूज अवेयरनेस डे है, और पत्रिका आपको ऐसे ही कुछ बुर्जुर्गों की आपबीती बता रहा है।

बेटा और बहु के लिए है घर, मेरा तो यही है सहारा
वल्लभ नगर वार्ड में रहने वाले छोटे लाल को अपने घर के 1 किमी ही दूर वृद्धाआश्रम में रहना पड़ रहा है। इनके दो बेटे और दो बेटियां हैं, लेकिन परिवार में इनके लिए कोई जगह नहीं है। छोटे लाल ने बताया उनकी पूरी जिंदगी संघर्ष में बीती। उन्होंने बताया ठेकेदारी करके घर खर्च चलाया और पैसे जोड़कर बच्चों की शादी की। दोनों बेटे काम कर रहे हैं। लेकिन मैं उनके पास नहीं रह सकता हूं। अब इस उम्र में जैसा जीवन जीना में चाहता हूं वो घर पर नहीं मिलता है। १ साल से यहीं वृद्धाआश्रम में हूं।

पिता ने अकेले दो बेटों का पाला, अब नहीं उनके के लिए सहारा

16 जून रविवार को सभी फार्दस डे मनाएंगे। लेकिन वृद्धाआश्रम में एक ऐसे पिता हैं जिन्होंने अकेले अपनी संतानों को पाला और अब उन्हें ही घर पर रहने के लिए जगह नहीं है। बमौरी खुर्द में रहने वाले वीर सिंह हजारी की पत्नी 40 साल पहले ही इस दुनिया में नहीं रही। जब इनका बड़ा बेटा छत्रसाल सिंह 7 साल का और शिवराज सिंह ४ साल का था। पूरी जिदंगी इन्होंने अपने बेटे के नाम कर दी। दोनों बेटे इन दिनों फॉरेस्ट विभाग में हैं। सिंह ने बताया कि कुछ समय तक बेटी के पास रहा लेकिन उसकी सुसराल में रहना मुझे सही नहीं लगा। मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है और उम्र लगभग 81 है। ऐसे में मैं वृध्दाआश्रम आ गया और अब यहां खुश हूं। बेटों के यहां अपशब्द सुनने से अच्छा है कि मैं यहां हूं और कभी-कभी उनसे मिलकर खुश रहता रहूं।

बूढी़ं मां को यहां रहने छोड़ा
2 साल पहले कल्लो बाई बरतुआं से रहने यहां पहुंची। घर पर दो बेटा-बहू हैं लेकिन उनसे उन्हें कोई सहारे की उम्मीद नहीं है। वे कहती हैं घर पर अब बहुओं का राज है। कल्लोबाई ने बताया कि इंद्रराज और छोटेलाल दो बेटे हैं और दोनों ठेकेदारी का काम करते हैं। उन्होंने मुझे यहां रहने के लिए छोड़ा है। बेटा भी ज्यादा कमाई नहीं क र पाते हैं, आज भी हमें उनसे कोई बुराई नहीं है।

बेटो की शादी कर दी, उनकी चिंता से यहां आकर रहने लगे

सिविल लाइन में रहने वाले उमाशंकर तिवारी दो वर्षों से वृद्धाआश्रम में हैं। तिवारी ने अपने बच्चों को शादी कर दी और वे स्वंय यहां आकर रहने लगे। तिवारी ने बताया कि दो बेटे हैं और दोनों मजदूरी करते हैं। दोनों की शादी हो गई है। उनके घर खर्च को लेकर कोई झगड़े न हो इसलिए हम यहां आकर रहने लगे हैं। अब यहीं जिंदगी गुजारनी है। बुढ़ापे में बेटों को परेशान नहीं करना चाहते हैं।

दुरव्यवहार नहीं बुजुर्गों का करों सम्मान

- बुजुर्गों के सम्मान के लिए सबसे जरूरी है कि आप उनसे प्यार करें। वैसे उनकी देखभाल कैसी होती है यह काफी हद तक हमारे संस्कारों से तय होता है।

- वित्तीय जरूरतों और बीमा संबंधी मामलों में उनकी राय लें। इस मामले में उनका अनुभव काफी काम आएगा। इससे उनको लगेगा कि आप उनकी अहमियत समझते हैं।

- घर में हो सके तो उनके साथ ही बैठ कर खाना खाएं, इससे उनको अकेलापन नहीं सालेगा और रिश्तों में मिठास आएगी।

- उनके गुस्से और विरोध को सहने की क्षमता रखें। कभी भी असहमति में बोले गए आपके स्वर इतने तल्ख न हों कि उनके दिल को ठेस पहुंच जाए।

- बुजुर्गों का अनुभव ज्ञान का खजाना होता है। हो सकता है उनके सुनाए गए अनुभवों से आपको अपने जीवन की किसी परेशानी को हल करने का सही जवाब मिल जाए। ऐसा करने से वे अकेलापन भी महसूस नहीं करेंगे और अपनी अहमियत होने से गौरवांवित भी महसूस करें।