सागर

अब बुंदेलखंड के किसान होंगे मालामाल, अलसी से आएगी खुशहाली

MP Farmers: अब तक कंपनियां यह डंठल चीन, फ्रांस और यूक्रेन जैसे ठंडे देशों से मंगाती हैं, जबकि अपने यहां किसान जला देते हैं। लेकिन अब एमपी के बुंदेलखंड के किसान ही सप्लाई करेंगे अलसी के डंठल, कृषि अनुसंधान केंद्र की पहल पर कंपनियों और किसानों के बीच बैठा तालमेल...

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Mar 31, 2025
MP Farmers: बुंदेलखंड के किसानों की पहल, अब सप्लाई करेंगे अलसी के डंठल, कपड़ा, पेपर आदि होंगे तैयार

MP Farmers: बुंदेलखंड के किसान (Bundelkhand Farmers) लिनिन के महंगे कपड़े, नोट व सिगरेट के पेपर बनाने वाली कंपनियों को अलसी के डंठल (flax stalks) की सप्लाई करेंगे। कृषि अनुसंधान केंद्र सागर की पहल से कंपनियों व किसानों में तालमेल हो गया है। किसानों को अलसी के डंठल एकत्रित करने से लेकर परिवहन तक का भार के अनुसार भुगतान मिलेगा। लिनिन के अलावा अलसी के रेशों से पैराशूट की रस्सी, दरी, पर्दे, वॉलपेपर, पेंटिंग पेपर, कैनवस, सिगरेट व करेंसी पेपर बनाए जाते हैं। अब तक कंपनियां यह डंठल चीन, फ्रांस और यूक्रेन जैसे ठंडे देशों से मंगाती हैं, जबकि अपने यहां किसान जला देते हैं।

प्रति हेक्टेयर 90 हजार रुपए का मुनाफा

एक हेक्टेयर में करीब 17-18 क्विंटल डंठल निकलता है। अनुमान है कि कंपनियां प्रति क्विंटल डंठल का किसानों को एक हजार रुपए का भुगतान करेंगी। डंठल से ही अलसी की खेती की लागत निकल आएगी। अलसी की पैदावार प्रति हेक्टेयर 18-23 क्विंटल होती है और दाम 4500 रुपए प्रति क्विंटल हैं। ऐसे में 20 क्विंटल औसत पैदावार मानें तो, प्रति हेक्टेयर 90 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा होगा। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि क्षेत्र में अलसी का रकबा भी बढ़ेगा।

12 साल में 8 नई प्रजातियां विकसित

सागर के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (Jawaharlal Nehru Agriculture University)के क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र पयासी ने 12 साल में अलसी की 8 प्रजातियां विकसित कीं। ये किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं। सभी किस्मों में बीज के साथ 15-20% प्राकृतिक रेशा पाया जाता है, जो टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए जरूरी कच्चा माल है।


Published on:
31 Mar 2025 12:22 pm
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