
पिता के मोक्ष के लिए भगवान राम ने इन जगहों पर किया था तर्पण
कर्म फल और पितृलोक
हिंदू धर्म के अनुसार जन्म के साथ ही प्रत्येक आत्मा जीवन चक्र (यानी जन्म-मृत्यु के बंधन) में बंध जाती है, फिर उसे जीवन कर्म करते हुए इस बंधन से मुक्त होना होता है, यानी उसे परमात्मा में विलीन होना (मोक्ष पाना) होता है। और इससे पहले वह 84 लाख योनियों में भटककर अपने कर्मफल भुगतता है। इसके अलावा उर्ध्व गति आत्माएं पुनर्जन्म से पहले 1 से 100 वर्ष तक मृत्यु और पुनर्जन्म के मध्य पितृ लोक में वास करती हैं, जिनकी शांति के लिए वंशजों को कई विधान बताए गए हैं, जिनमें से एक श्राद्ध (पितरों के निमित्त श्रद्धा पूर्वक किया धार्मिक कार्य), तर्पण (पितरों के निमित्त जल के साथ तिल, चावल अर्पण) और पिंडदान (चावल के पिंड का दान) है। मान्यता है यह पितरों को प्राप्त होता है, आइये जानते हैं भगवान ने पिता दशरथ का पिंडदान कहां-कहां किया...
क्यों जरूरी है पिंडदान
पुराणों के अनुसार आत्मा भौतिक शरीर छोड़ कर सूक्ष्म शरीर धारण करती है, इस अवस्था में उसमें मोह, माया, भूख और प्यास का अतिरेक होता है यानी वह प्रेत होता है और सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है। यही पितर, पितृ पक्ष में चंद्रमा की रोशनी के साथ पृथ्वी पर आते हैं और श्राद्ध पक्ष में अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को इसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। यही श्राद्ध पितरों को प्राप्त होता है और उन्हें शांति मिलती है। अब आइये जानते हैं भगवान राम ने कहां-कहां राजा दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान किया..
अयोध्या लौटने के बाद भगवान राम ने इन जगहों पर किया तर्पण
मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने गया के फल्गू नदी तट पर पिंडदान के लिए अयोध्या से प्रस्थान किया तो पहला पिंडदान सरयू, दूसरा पिंडदान प्रयाग के भरद्वाज आश्रम, तीसरा विन्ध्यधाम स्थित रामगया घाट, चौथा पिंडदान काशी के पिशाचमोचन को पार कर गया में किया। यहां प्रायः पितृ पक्ष में श्राद्ध का विशेष महत्व है। लेकिन गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति भी दी गई है। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि गया में पिंडदान के समय भगवान राम के कहीं जाने और आकाशवाणी होने से यहां मां सीता ने दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान कर दिया था।
इस कारण मीरजापुर में किया श्राद्ध
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार गया में फल्गु नदी के किनारे पिंडदान से ही पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वहां से पहले मोक्षदायिनी गंगा, विन्ध्य पर्वत के संधि स्थल पर पिंडदान करना चाहिए। इसी के चलते गुरु वशिष्ठ के आदेश पर पिता दशरथ और अन्य पितरों की मोक्ष कामना से गया जाते वक्त भगवान राम ने मीरजापुर में विंध्याचाल धाम से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित शिवपुर गांव में कर्णावती नदी संगम पर ( गंगा घाट यानी रामगया घाट) पर श्राद्ध किया था। इसीलिए इस घाट को राम गया घाट और छोटा गया भी कहते हैं। मान्यता है कि यहां पितरों का श्राद्ध करने से महान पुण्य फल मिलता है। यह जगह पितरों के मोक्ष की कामनास्थली मानी जाती है।
अयोध्या लौटने से पहले यहां भी दशरथ के तर्पण की मान्यता
मान्यता है कि भगवान राम के अयोध्या से वनगमन के बाद राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिये और बाद में वनवास के दौरान उन्हें इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने यहीं पर पिता के तर्पण के विधान को पूरा किए। इस दौरान उन्होंने इन जगहों पर दशरथ जी के लिए तर्पण किए।
उज्जैन
मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम महाकाल की नगरी उज्जैनी भी पहुंचे थे। यहां मोक्षदायनी मां शिप्रा के तट पर रामघाट पर अपने पिता का तर्पण किया था। इसी कारण यहां भी गया जैसा ही पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध का महत्व है।
गोदावरी किनारे जलांजलि
श्रीरामचरित मानस में भगवान श्री राम द्वारा राजा दशरथ और जटायु के लिए गोदावरी नदी के तट पर जलांजलि देने का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा भरत जी द्वारा दशरथ के लिए दशगात्र विधान का उल्लेख तुलसी रामायण में मिलता है।
Updated on:
12 Jan 2024 06:09 pm
Published on:
12 Jan 2024 06:01 pm
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