
गोविंद साहू@राजनांदगांव.cg election 2023 : दौर ऐसा भी था जब चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी साइकिल से प्रचार करने निकलते थे। कार्यकर्ता भी 20-25 किलोमीटर तक साइकिल से सफर करने में कोई गुरेज नहीं करते थे। प्रत्याशियों को बूथों में पैसे भी नहीं देने पड़ते थे। कार्यकर्ता अपने स्तर पर चुनाव चिन्ह देखकर दीवार लेखन करा देते थे। रिक्शे में रिकॉर्डिंग बजाकर प्रचार करने का चलन था। अब तो प्रचार के सारे माध्यम हाईटेक हो चले हैं। सोशल मीडिया का वार चल रहा है। बैनर, पोस्टर और होर्डिंग प्रचार के बड़े माध्यम बन गए हैं।
हर गांव तक नहीं पहुंच पाते थे
CG Election 2023 : राजनीति से जुड़े वरिष्ठजनों की मानें तो पहले प्रत्याशी प्रत्येक गांव में जाएं, घर-घर लोगों से संपर्क करें ऐसा संभव नहीं था। गाड़ियां भी कम थीं। प्रत्याशियों का वोटरों से आत्मीयता का रिश्ता होता था। वोटर भी प्रत्याशी को चुनाव लडऩे के लिए आर्थिक मदद करते थे। अब ऐसी बात नहीं है। अब प्रत्याशियों के चाल-चलन, चेहरा और चरित्र का पूरा आंकलन होता है। अब प्रचार-प्रसार दीवार लेखन से बदलकर बैनर-पोस्टर, फ्लैक्स से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में बताने और जताने का समय है।
चलता है आरोप-प्रत्यारोप
CG Election 2023 : बदलते समय के साथ चुनाव में बड़ी तेजी के साथ विकृति भी आती जा रही है। चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रत्याशी दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कीचड़ उछालने से परहेज नहीं कर रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप भी खूब लगते हैं। छोटे-बड़े नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं का भी जुबानी जंग चलता है। सोशल मीडिया में विवाद की स्थिति होती है। कई तरह की चर्चाएं और लॉबिंग होती है। जबकि 1950-60 के दशक में प्रत्याशी और कार्यकर्ता 20-20 किमी साइकिल से ही प्रचार करते थे।
40 लाख खर्च की सीमा
CG Election 2023 : विधानसभा चुनाव को लेकर प्रत्याशी इन दिनों प्रचार-प्रसार में पसीना बहा रहे हैं। पहले जहां आजादी के बाद प्रत्याशी चुनाव सिंबाल के आधार पर जीत जाते थे। अब चुनाव प्रचार मीडिया व सोशल मीडिया पर आधारित हो गया है। अब चुनाव खर्चीला भी हो गया। 50 साल पहले जहां चुनाव में मुश्किल से 5 से 7 हजार रुपए खर्च आता था। आज मुख्य निर्वाचन आयोग ने एक प्रत्याशी का खर्च 40 लाख तय किया है और सभी जानते हैं, खर्च करोड़ों में होती है।
प्रत्याशी के लिए गाड़ी छोड़कर ट्रक में लौटे
भाजपा से जुड़े खूबचंद पारख बताते हैं कि पहले रिक्शा में रिकॉर्डिंग गाने बजाकर प्रचार करते थे। कार्यालय में मीटिंग होती थी। अपने-अपने साधन से कार्यकर्ता प्रचार में जाते थे।अंत में एक रैली निकाल ली जाती थी। बूथ में पैसा नहीं देना पड़ता था। एक लोकसभा में आठ गाड़ी लगती थी। अब एक विधानसभा में 35 से 40 गाडि?ां लग रहीं हैं। उन्होंने बताया कि 1984 में वे अपनी गाड़ी लेकर चुनाव प्रचार में खैरागढ़ गए थे, तो क्षेत्र में प्रचार के लिए अपनी गाड़ी प्रत्याशी के लिए छोड़कर ट्रक में बैठकर लौट आए थे।
जमीनी मुद्दों परचुनाव लड़ते थे
कांग्रेस से जुड़े श्रीकिशन खंडेलवाल बताया कि उन्होंने 1990 में राजनांदगांव विस से चुनाव लड़ा था तब महज दो ढाई लाख खर्च हुए थे। हालांकि वे अपने निकट प्रतिद्वंदी भाजपा प्रत्याशी लीलाराम भोजवानी से चुनाव हार गए थे। वे बताते हैं कि उस दौर में पहले वोटर को विश्वास में लिया जाता था, समस्याएं सुनीं जाती थीं। अब इसमें काफी बदलाव आ गया है। प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की हत्या मुद्दा बना फिर राम मंदिर मुद्दा बना। पहले चुनाव में जमीनी मुद्दे होते थे। अब चुनाव हवा-हवाई बातों पर लड़े जाने लगे हैं।
कार्यकर्ता करते थे दीवार लेखन
कांग्रेस से जुड़े अशोक फडऩवीस ने बताया कि 1960 के दौर में टीन के भोंपू से भी प्रचार होता था। गाडियां नहीं होती थी, तो साइकिल और पैदल चलकर भी प्रचार करते थे। रायपुर-भिलाई और नागपुर से तक गाडियां मंगाई जाती थीं। कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी के लिए घेरू और नील रंग लेकर गांव-गांव में दीवार लेखन करते थे। अब जमाना बैनर-पोस्टर और फ्लैक्स का है। गांव में यदि प्रचार करने वाली गाड़ी पहुंच जाती थी, पार्टी का बिल्ला लेने के लिए ग्रामीण और बच्चे दौड़ पड़ते थे। अब परिस्थिति बहुत बदल गई है।
Published on:
24 Oct 2023 06:05 pm
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