
जयंती विशेष: आज के दिन धरती से प्रकट हुई थी मां सीता, छत्तीसगढ़ से हैं ये संबंध
रायपुर. आज 13 मई को सीता जयंती (Sita Jayanti) है। इसे मां सीता के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है। वैसे तो वैशाख मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को भी जानकी जयंती के रूप में मनाया जाता है परंतु भारत के कुछ क्षेत्रों में फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष को सीता जयंती के रूप में मनाते हैं। इस तथ्य का उद्घाटन निर्णय सिंधु से भी प्राप्त होता है, जिसके अनुसार फाल्गुन माह की कृष्णपक्ष के दिन सीताजी का जन्म हुआ था इसीलिए इस तिथि को सीताष्टमी के नाम से भी संबोद्धित किया जाता है।
छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)में भगवान राम का ननिहाल भी है। इसके अलावा ये छत्तीसगढ़ को भगवान राम के वनवास काल के पथगमन मार्ग के रूप में चिह्नित किया गया है। भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के यहां वनवास गुजारने के कई अवशेष मौजूद है। राजिम में स्थित कुलेश्वर महादेव का मंदिर भी इन्ही में से एक है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जिस जगह मंदिर स्थित है, वहां कभी वनवास काल के दौरान मां सीता ने देवों के देव महादेव के प्रतीक रेत का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। आज जो मंदिर यहां मौजूद है उसका निर्मांण आठवीं शताब्दी में हुआ था।
सीता जयंती के उपलक्ष्य पर भक्तगण माता की उपासना करते हैं। परंपरागत ढंग से श्रद्धापूर्वक पूजन-अर्चन किया जाता है। सीताजी की विधि-विधान पूर्वक आराधना की जाती है। इस दिन व्रत का भी नियम बताया गया है, जिसे करने के लिए व्रतधारी को व्रत से जुड़े सभी नियमों का पालन करना चाहिए। पूजन में चावल, जौ, तिल आदि का प्रयोग करना चाहिए। इस व्रत को करने से सौभाग्य सुख व संतान की प्राप्त होती है। मां सीता लक्ष्मी ही रूप है। इस कारण इनके निमित्त किया गया व्रत परिवार में सुख-समृद्धि और धन की वृद्धि करने वाला होता है। एक अन्य मत के अनुसार माता का जन्म क्योंकि भूमि से हुआ था, इसलिए वे अन्नपूर्णा कहलाती हैं। माता जानकी का व्रत करने से उपासक में त्याग, शील, ममता और समर्पण जैसे गुण आते है।
सीता मां का चरित्र सभी के लिए मार्गदर्शक रहा है और आज भी प्रासंगिक है। सीता उपनिषद् जो कि अथर्ववेदीय शाखा से संबंधित उपनिषद् है, जिसमें सीताजी की महिमा एवं उनके स्वरूप को व्यक्त किया गया है। इसमें सीता को शाश्वत शक्तिका आधार बताया गया है तथा उन्हें ही प्रकृति में परिलक्षित होते हुए देखा गया है। सीताजी ही प्रकृति हैं, वही प्रणव और उसका कारक भी हैं। शब्द का अर्थ अक्षरब्रह्म की शक्ति के रूप में हुआ है। यह नाम साक्षात् योगमाया का है। देवी सीताजी को भगवान श्रीराम का साथ प्राप्त है, जिस कारण वह विश्वकल्याणकारी हैं।
सीताजी जगमाता और श्रीराम को जगत पिता बताया गया है। वाल्मीकि रामायण में तथा वेद-उपनिषदों में सीता के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानस में सीता को संसार की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाली माता कहते हुए नमस्कार करते हैं, एक पुत्री, पुत्रवधू, पत्नी और मां के रूप में उनका आदर्श रूप पूजनीय रहा है।
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Published on:
13 May 2019 11:36 am
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