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बात हो रही स्कूलों में हाईटेक सुरक्षा की, पर यहां तो कभी भी भरभराकर गिर जाती है छत की प्लास्टर

- हाईटेक सिक्यूरिटी सिस्टम तो दूर इन स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए सुरक्षित भवन तक नहीं है मुफीद 

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बात हो रही स्कूलों में हाईटेक सुरक्षा की, पर यहां तो कभी भी भरभराकर गिर जाती है छत की प्लास्टर

जुलाई माह में कन्या स्कूल के छत की प्लास्टर भर-भरा कर गिर गई थी।

रायगढ़.हरियाणा के रेयान स्कूल में छात्र की हत्या के बाद पूरे देश की निगाह स्कूलों में हाईटेक सिक्यूरिटी सिस्टम पर है। निर्देश जारी हो रहे हैं, बैठकें हो रही हैं चर्चा गरम है। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत इससे उलट दिखती है हाईटेक सिक्यूरिटी सिस्टम तो दूर इन स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए सुरक्षित भवन तक मुफीद नहीं है हाल में ही धरमजयगढ़ में कन्या स्कूल में छत की प्लास्टर भरभरा कर गिर गई थी। गनीमत रहा कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।

जिले के 77 जर्जर स्कूलों में हजारों बच्चे अपना भविष्य गढऩे को मजबूर हैं। पालक हर दिन एक आशंका और भय के साथ अपने बच्चे को स्कूल विदा करते हैं ये वो स्कूल हैं जिसमें अन्य सुरक्षा मानकों की तो बात ही नहीं हो रही है इनके भवन ही जर्जर हो चुके हैं। सवाल पूछने पर एक ही जवाब मिलता है कि सुधार और मरम्मत के लिए प्रस्ताव भेजा गया है, पर सच यह भी है कि हर साल इस प्रस्ताव को भेजा जा रहा है पर हो कुछ नहीं रहा है।

इन स्कूलों के विषय में केवल यही कहा जा सकता है कि यहां छात्र-छात्राओं की सुरक्षा को ताख पर रख दिया गया है वहीं इन स्कूलों में मूलभूत सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवाई गई है। जिले के 77 स्कूल अति जर्जर स्थिति में विभाग के रिकार्ड में है जहां मरम्मत के लिए प्रस्ताव भी कई बार बने हैं लेकिन मरम्मत का काम आज पर्यंत तक नहीं हो पाया है।
इसके कारण कई स्कूलों में छात्र जर्जर भवन में ही बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं तो कई भवन के अभाव में जैसे-तैसे काम चला रहे हैं। इसके कारण वहां पढऩे वाले छात्रों से लेकर शिक्षकों में भी भय का माहौल है।

बताया जाता है कि उक्त स्कूलों में भवनों के मरम्मत के लिए विभाग हर साल प्रस्ताव बनाकर मंगाती है, लेकिन गिने चुने स्कूलों में ही काम हो पाता है। शेष स्कूलों की स्थिति जस की तस होती है। इसके अलावा जिले में दो दर्जन से अधिक ऐसे सरकारी स्कूल होने की बात कही जा रही है जहां बाउंड्रीवॉल नहीं है। स्कूलों में बाउंड्रीवॉल को लेकर अभिभावक व जनप्रतिनिधि हमेशा मांग करते आ रहे हैं लेकिन आज तक इसका निर्माण नहीं हो सका।

यहां दिखी ऐसी स्थिति- वहीं शहर के अत्तरमुड़ा क्षेत्र में संचालित प्रायमरी स्कूल व मीडिल स्कूल माझापारा में बाउंड्री नाम मात्र की है। यहां बाउंड्रीवॉल का निर्माण इतनी ऊंचाई तक किया गया है कि कोई भी एक छलांग में स्कूल के अंदर जा सकता है। वहीं स्कूल के अंदर कमरे के छज्जों के प्लास्टर उखड़ गए हैं। जिसके कारण छड़ बाहर दिख रहा है। इसीप्रकार चक्रधर नगर औद्योगिक पार्क में अंबेडकर प्रााथमिक शाला संचालित हैं यहां भी स्कूल के चारों ओर कोई बाउंड्रीवॉल नहीं है। इसके कारण स्कूल प्रबंधन ने पेड़ लगाकर सुरक्षा के उद्देश्य से बाउंड्री का जुगाड़ किया है। शहर के आस-पास ही कई ऐसे सरकारी स्कूलें संचालित हो रही है जहां बाउंड्रीवॉल नहीं है ग्रामीण क्षेत्र में संचालित सरकारी स्कूलों में कुछ ऐसा ही नजारा है।

शिक्षकों की कमी - जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। विषय विशेष के शिक्षक नहीं होने के कारण विभाग को सीएसआर का सहारा लेना पड़ता है जिसके कारण हर साल चार से पांच माह सत्र चालू होने के बाद शिक्षक भर्ती करने में लग जाता है।

-सुरक्षा के जो नियम बताए जा रहे हैं उसे सबसे पहले शासकीय स्कूल में लागू किया जाना चाहिए। जिले के 90 प्रतिशत स्कूलों में सुरक्षा के इंतजाम काफी लचर हैं- शशिकांत शर्मा, बुद्धिजीवी

-जर्जर भवनों की स्थिति और स्कूलों में सुरक्षा को लेकर विभाग और सरकार को पहल करनी चाहिए, यह बच्चों के लिए आतिआवश्यक है इस पर ध्यान देना ही होगा तभी हालात सुधर सकेंगे- शैलेंद्र मिश्रा, प्रवक्ता, शिक्षक संघ

-इसे व्यवस्था में संरचनागत असमानता कहा जा सकता है। आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि वास्तव में जब से नवउदारवादी दृष्टि आई है उस समय से ही शिक्षा और चिकित्सा से सरकार ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। बाजारवाद के कारण शिक्षा और चिकित्सा को कमोडिटी में शामिल कर दिया गया है। जो स्थिति आप बता रहे हैं उसे व्यवस्था की असमानता कहा जाता है। इसे बदलने में काफी मेहनत करनी होगी। समाज को मुखर होना होगा, सरकार को गंभीर होना होगा तभी हालात सुधर सकेंगे। अभी तो केवल मुखर पर ही ध्यान दिया जा रहा है- प्रभात त्रिपाठी, साहित्कार व लेखक

-जर्जर भवनों को लेकर प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। इसमें स्वीकृति मिलने के बाद काम चालू करा दिया जाएगा। इसके अलावा बाउंड्रीवॉल के लिए भी अलग-अलग मदों से काम कराए जा रहे हैं- आरपी आदित्य, डीईओ, रायगढ़