कन्नौज इत्र बनाने और देश दुनिया में सप्लाई का केन्द्र हैं। 1930 में हाजी इनायत अली यहां से भोपाल आए। इनके बाद इनके पुत्र हाजी मोहम्मद युनूस ने 1946 से 2017 तक इत्र का काम किया। इसमें कई प्रयोग भी इनके जरिए किए गए। इनकी महक ही अलग है। इब्राहिमपुरा में इस काम से जुड़े हाजी रफीक अहमद ने बताया कि तीसरी पीढ़ी है जो इस विरासत को आगे बढ़ा रही है। वर्तमान में इत्र की कई वैराइटी हैं। इसके चाहने वाले भी बहुत हैं। तीन पीढिय़ां इसी काम में जुटी रहीं। ऐसे में कई नई खुशबुओं को भी तैयार किया।
इसके अलावा शहर में चौक जैन मंदिर के पास इत्र की सबसे पुरानी दुकान थी। जो कि अब बंद हो गई। ये भी करीब सौ साल पुरानी थी। जुमेराती में दो दुकानें पचास साल से ज्यादा पुरानी हैं। इनमें से एक के सलीम ने बताया उनके पिता ने काम शुरू किया था। अब वे इसे संभाल रहे हैं।
गर्मियों में बढ़ जाती है मांग इत्र की मांग गर्मियों में बढ़ जाती है। वहीं अगले माह से रमजान का महीना भी शुरू हो रहा है। खास इत्रों में से इत्र सेहरा जड़ी बूटी से बनता है। गर्मी के हिसाब रूहे गुलाब, रूहे खस, इत्र फौजिया हैं। सबसे महंगे बिकने वालों में इत्र देहने ऊद 12 हजार रुपए प्रति दस ग्राम है वहीं इत्र बखूर 14 से 18 हजार रुपए प्रति दस 10 ग्राम है। हाजी रफीक के मुताबिक शहर में इत्र का कारोबार करीब दो करोड़ रुपए का है।