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चलते-फिरते देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं 110 वर्षीय संत

हर पुरस्कार से ऊपर शतायु पार संन्यासी महास्वामी डॉ. शिवकुमार चरण स्पर्शकर, आशीर्वाद लेने के लिए रोज सुबह-शाम लगती है कतार

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shivkumar swamy

राजेन्द्र शेखर व्यास

बेंगलूरु. उम्र 110 साल, ऊर्जा अपार, उन्नत भाल और मानवता की मिसाल...! ये हैं आज के आधुनिक और तकनीकी दौर में असाधारण व्यक्तित्व और चलते-फिरते देवता के रूप में प्रसिद्ध संत श्रीश्रीश्री डॉ. शिवकुमार महास्वामी। वे मूर्धन्य हैं, प्रकाण्ड पंडित हैं और ऊर्जा का भण्डार हैं। शतायु पार वय के बावजूद वे युवाओं में संस्कार शिक्षा, जागरूकता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के साथ लोकोपकारी कार्यों में तल्लीन हैं। वे मठ और मंदिरों के राज्य के रूप में प्रसिद्ध कर्नाटक के तुुमकूरु जिला मुख्यालय स्थित सिद्धगंगा मठ के प्रमुख हैं। आमजन और श्रद्धालु ही नहीं केन्द्र सरकार के मंत्री, राजनेता, अधिकारी, उद्यमियों सहित अपने-अपने क्षेत्र में महारत का मुकाम पा लेने वाली बड़ी बड़ी हस्तियां इस असाधारण संन्यासी की एक झलक पाने को लालायित रहती हैं और चरण स्पर्शकर, आशीर्वाद लेकर खुद को धन्य मान लेती हैं। इसीलिए तुमकूरु के इस सिद्धगंगा मठ मेंं रोज श्रद्धालुओं की कतार लग जाती है। यही नहीं वे जिस मार्ग से गुजरते हैं लोग उनके चरणों की रज अपने ललाट पर लगाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी भी उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं।

आत्मशक्ति का महापुंज
जब महास्वामी का जन्म हुआ तब महात्मा गांधी 39 साल की वय में दक्षिण अफ्रीका में वकालत कर रहे थे और 19 वर्ष के जवाहरलाल नेहरू कैम्ब्रिज में विज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे। जब वे उम्र के 11वें पड़ाव पर पहुंचे तो पहला विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था, 14 साल की अवस्था हुई तो सोवियत संघ का गठन हुआ। जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ तब उनकी उम्र 37 साल थी और 61वां बसंत देखा तो नील आम्र्सस्ट्रांग चांद पर कदम रख चुके थे। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो वे उम्र के 83वें पड़ाव पर थे। इस उम्र तक तक पहुंचते-पहुंचते शरीर कृशकाय हो जाता है, थकान हावी हो जाती है।...लेकिन, इसे नकारते हुए ये असाधारण संत शक्ति ? का महापुंज बने हुए हैं। श्रीश्रीश्री शिवकुमारस्वामी आगामी 1 अप्रेल 2018 को उम्र के 111वें पड़ाव पर होंगे, लेकिन ऐसा कहीं नहीं लगता कि प्रेरक शक्ति कहीं कम हुई हो। अपने जीवन काल में उन्होंने जितना लंबा सफर तय किया उसे उतनी ही ऊंचाई और सागर की मानिंद गहराई दी है।

रोशनी का अखण्ड दीप महास्वामी
अपने अथक प्रयासों से शिक्षा, जनसेवा और मानवता का जो अखंड दीप उन्होंने जलाया है उसकी रोशनी आने वाली कई-कई पीढिय़ों का मार्ग रोशन और प्रशस्त करती रहेगी। पद्मविभूषण से सम्मानित हो चुके महास्वामी के लिए अब आमजन और राज्य सरकार ने भारत रत्न की भी सिफारिश की है, लेकिन शिव का अवतार कहे जाने वाले महास्वामी डॉ. शिवकुमार हर पुरस्कार से ऊपर हैं।

जब गुरु ने ली कड़ी परीक्षा
पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित सिद्धगंगा मठ का वर्ष 1941 में प्रभार संभालने से पहले उनके गुरु उद्दाना स्वामी ने न सिर्फ कड़ी परीक्षा ली बल्कि शिक्षा एवं संस्कारों की ऐसी मजबूत नींव डाली कि एक असाधारण व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। कहा जाता है कि उद्दाना स्वामी जब सिद्धगंगा मठ के प्रमुख बने तो उन्हें कड़ाई से काम ? लेने वाले गुरु के रूप में जाना गया। उस समय युवा शिवकुमार स्वामी के कंधे पर गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के अलावा मठ के तमाम कार्य निपटाने की भी जिम्मेदारी थी। एक दिन दोपहर कड़ी धूप में जंगल में पहाडिय़ों से जलाऊ लकडिय़ां लेकर लौटे शिवकुमार स्वामी थक गए और कुछ देर आराम करने लगे। उद्दाना स्वामी को जब इसकी भनक लगी तो वे तुरंत शिवकुमार स्वामी के पास पहुंचे और कहा 'क्या मैंने तुम्हें यहां लाकर संन्यास की दीक्षा इसलिए दी है कि दोपहर में सो सको। एक संन्यासी दोपहर में नहीं सो सकता। यह संन्यास धर्म के खिलाफ है।' वर्ष 1930 से 1941 तक गुरु के सान्निध्य में कड़ी शिक्षा प्राप्त करने वाले शिवकुमार स्वामी आज तक उनके निर्देशों पर चल रहे हैं और वही शिक्षा, वही ज्ञान अपने अनुयायियों को भी देते आ रहे हैं।

110 की उम्र में भी नित्य संध्योपासना
कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरु से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित सिद्धगंगा मठ शीर्ष वीरशैव और लिंगायत मठों में से एक है, जिसे किफायती एवं आधुनिक शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए जाना जाता है। ग्यारह दशक की उम्र पार कर चुके डॉ. शिवकुमार महास्वामीजी सनातन धर्म के शास्त्रों के परम ज्ञाता है और अब भी इस धर्म की मान्यता के अनुरूप यम-नियम का पालन करते हुए नित्य संध्योपासना, पूजा करते हैं। युवाओं की तरह धर्म, संस्कार, शिक्षा, गरीबों की सेवा सहित अनेक लोकोपकारी कार्यों में संलग्न रहते हैं। यद्यपि हिंदु धर्म की मान्यताओं के अनुरूप उन्होंने भले कभी सागर पार नहीं किया, लेकिन गरीबी के दलदल में फंसे लाखों बच्चों को शिक्षित कर विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा दिया है।

नौ हजार बच्चों को संस्कार शिक्षा
फिलहाल, सिद्धगंगा मठ द्वारा संचालित 132 शिक्षण संस्थाओं के जरिए हजारों गरीब बच्चे सस्ती और आधुनिक गुणवत्तापरक शिक्षा हासिल कर रहे हैं। तूमकुरु स्थित मठ के गुरुकुल में प्रतिदिन 6 से 16 साल की वय के करीब नौ हजार बच्चे संस्कार शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। हजारों गरीबों की भूख भी यहीं नि:शुल्क मिटती है।

महास्वामी का दर्शन और उपदेश अनूठे
न्यूयार्क के एक शीर्ष मनोचिकित्सा संस्थान में वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक डॉ. वीरण्णा कहते हैं-'मैंने एक गरीब परिवार में जन्म लिया। मुझे दस वर्ष की उम्र में मठ में दाखिला मिला और उसके तुरंत बाद एक महामारी ने मेरे अभिभावकों को छीन लिया। अब हजारों अनाथ बच्चों की तरह मेरे अभिभावक भी स्वामी जी ही थे। उन्हें बिना थके 18 से 20 घंटे तक लगातार काम करते देखना और उनके अनूठे उपदेश, दर्शन का मुझ पर काफी प्रभाव है।'

उच्च मुकाम और सेवा के प्रेरणास्रोत
डॉ. केएन तिमय्या कहते हैं 'मेरे गरीब और अनपढ़ माता-पिता ने मुझे मठ में नि:शुल्क शिक्षा के लिए भेजा। वहां के शांत वातावरण ने मुझे काफी प्रभावित किया जहां हजारों बच्चे पूरे मनोयोग से पढ़ाई कर रहे थे। स्वामीजी के सहयोग से मैंने रसायन शास्त्र में पीएचडी किया और कैंसर रिसर्च में सफल कॅरियर बनाया। आज विश्व के विभिन्न हिस्सों में कई प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर जिस उच्च मुकाम पर पहुंचकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सेवाएं दे रहे हैं वह स्वामीजी का ही आशीर्वाद है।'