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इस मंदिर परिसर में मौजूद हैं 22 कुंड, पानी में डूबकी लगाने से दूर होते हैं रोग और कष्ट

इस मंदिर परिसर में मौजूद हैं 22 कुंड, पानी में डूबकी लगाने से दूर होते हैं रोग और कष्ट

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भोपाल

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Tanvi Sharma

Jan 28, 2019

ramesharam

रामेश्वरम मंदिर हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थलों में से एक स्थान है। यह पवित्र तीर्थस्थल तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। भारतीय धर्मग्रंथों में बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम यात्रा का अपना ही महत्व है। यह तीर्थ हिंदुओं के चार धामों में से एक प्रमुख है। इसके अलावा मंदिर में स्थापित शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक शिवलिंग माना जाता है। इस मंदिर को रामनाथस्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं। यह भगवान शिव का एक हिन्दू मंदिर है जो देशभर में प्रसिद्ध मंदिर है। रामेश्वरम में हर साल लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते है। शिवलिंग के रूप में इस मंदिर में मुख्य भगवान श्री रामनाथस्वामी को माना जाता है।

मंदिर में देखने को मिलती है अलग-अलग शिल्पी

मंदिर लगभग 15 एकड़ के क्षेत्र में बना हुआ है। मंदिर में आपको कई प्रकाल के वास्तुशिल्पी देखने को मिलती है। मंदिर वैष्णववाद और शैववाद का संगम माना जाता है। मंदिर में कला के साथ-साथ कई प्रकार की अलग-अलग शिल्पी भी देखने को मिलेती है। इसका सबसे बड़ा कारण मंदिर की देखरेख व रक्षा कई राजाओं द्वारा किए जाने का है।

चमत्कारिक है यहां तीर्थम से निकलने वाला पानी

रामनाथ स्वामी मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां स्थित अग्नि तीर्थम में जो भी श्रद्धालु स्नान करते है उनके सारे पाप धुल जाते हैं। इस तीर्थम से निकलने वाले पानी को चमत्कारिक गुणों से युक्त माना जाता है। लोगों का मानना है कि इस के पानी में डुबकी लगाने वाले लोगों के सभी दुख कष्ट दूर होते हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। ये भी कहा जाता है कि इस पानी में नहाने के बाद सभी रोग−कष्ट दूर हो जाते हैं। इसके अलावा इस मंदिर के परिसर में 22 कुंड है जिसमें श्रद्धालु पूजा से पहले स्नान करते हैं।

रामायण काल से जुड़ा है मंदिर में स्थापित शिवलिंग का महत्व

रामायण युग में भगवान राम द्वारा शिवजी की पूजा अर्चना कर ही रामानाथस्वामी (शिवजी) के शिवलिंग को स्थापित किया गया था। रामायण के अनुसार एक साधु ने श्रीराम को कहा था कि शिवलिंग स्थापित करने से वहां रावण के वध के पाप से मुक्ति पा सकते हैं। इसीलिए श्रीराम ने भगवान हनुमानजी को कैलाश पर्वत पर एक शिवलिंग लाने के लिए भेजा लेकिन वह शिवलिंग लेकर समय पर वापस ना लौट सके। इसीलिए माता सीता ने मिट्टी की मदद से एक शिवलिंग तैयार किया जिसे रामलिंग कहा जाता है और हनुमान जी वापस लौटे तो उन्हें यह देखकर बहुत दुख लगा। उनके दुख को देखकर भगवान श्रीराम ने उस शिवलिंग का नाम वैश्वलिंगम रखा। इसी कारण रामनाथस्वामी मंदिर को वैष्णववाद और शैववाद दोनों का संगम कहा जाता है।