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किसी भी कला को या तो समाज बचा सकता है या फिर सरकार : शशधर आचार्य

- छऊ नृत्य के लोकप्रिय कलाकार शशधर आचार्य से बातचीत, जेकेके में आयोजित एक्टिंग वर्कशॉप में प्रतिभागियों से हो रहे रूबरू

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किसी भी कला को या तो समाज बचा सकता है या फिर सरकार : शशधर आचार्य

किसी भी कला को या तो समाज बचा सकता है या फिर सरकार : शशधर आचार्य

जयपुर. जवाहर कला केंद्र में चल रही एक्टर ट्रेनिंग वर्कशॉप में देश के जाने-माने एक्सपर्ट रूबरू हो रहे है और इनमें छऊ नृत्य के विशेषज्ञ पद्मश्री शशधर आचार्य भी शामिल है। आचार्य ने पत्रिका प्लस से बातचीत में अपने अनुभवों को साझा किया और छऊ नृत्य की खूबसूरती पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि छऊ नृत्य में सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें आंगिक अभिनय ज्यादा है। इसका थिएटर से सीधा संबंध है। छऊ एक्टर को फ्लेक्सिबल बनाती है, मन पर नियंत्रण रखना सिखाती है। बॉडी के बैलेंस के बिना मन का बैलेंस संभव नहीं। यह आंतरिक शक्ति एवं स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक होती है। इस विद्या के माध्यम से कलाकार ऑडिटोरियम में स्पेस को मेंटेन करना सीखते है।

पांच पीढि़यों से जुड़ाव

शशधर आचार्य ने बताया कि पिछले पांच पीढि़यों से मेरा परिवार छऊ नृत्य से जुड़ा हुआ है। पहले भारत में थिएटर और डांस अलग नहीं थे, फिर थिएटर को नृत्य (डांस एंड मूवमेंटस) से अलग कर दिया गया, म्यूजिक को अलग कर दिया गया। हमारे बुद्धिजीवियों ने इसे तीन भागों में बांट दिया, लेकिन तीनों के अभिप्राय एक ही हैं, वह है एक्सप्रेशन। सही मायने में थिएटर इन तीनों विधाओं के समागम से ही बनता था। आजादी के बाद कई कला संस्थान स्थापित हुए। मॉडर्न थिएटर या फोरेन थिएटर और उनके थ्योरी कॉन्सेप्ट आ गए। मुझे लगता है कि पहले हमें अपने देश की पद्धतियों को सीखने का प्रयास करना चाहिए।

राज्य सरकारों को करनी होगी पहल

उन्होंने कहा कि एनएसडी इस तरह की वर्कशॉप कई राज्यों में आयोजित करती है, लेकिन यदि राज्य सरकारों की ओर से इन कलाओं को प्रोत्साहित किया जाए तो यह बेहतरीन पहल साबित होगी। किसी भी कला को या तो समाज बचा सकती है या फिर सरकार। हम कला का सम्मान करेंगे तो ही कला अपना परिचय देगी। उन्होंने कहा कि एक अच्छा एक्टर वह होता है, जो सही समय पर सही तरीके से सही चीजों को लोगों के सामने प्रस्तुत कर सके। हर आर्ट फॉर्म अलग है, चाहे क्लासिकल हो, मॉडर्न हो, म्यूजिकल, फोक, रियलिस्टिक, कंटेम्परेरी, या फिर नुक्कड़ नाटक। आजकल कई लोग इन सभी चीजों को मिक्स कर देते हैं।

थिएटर के लिए धैर्य चाहिए, जल्दबाजी नहीं

उन्होंने कहा कि अगर हम नई पीढ़ी को भारतीय थिएटर के सांस्कृतिक इतिहास की मूल जड़ से नहीं जोड़ पा रहे हैं तो इसमें हमारी कमी है। ज्यादातर युवाओं में मुम्बई (फिल्मों में) जाने का चार्म अधिक है, थिएटर या अभिनय को समझने में रूचि कम है। थिएटर के लिए धैर्य चाहिए, जल्दबाजी नहीं। फिल्म और थिएटर में अंतर यह है कि फिल्म कल्पना है, थिएटर वास्तविकता है। उन्होंने कहा कि सिद्धांत व्यक्ति का चारित्रिक निर्माण करते हैं, वहीं आपको पहचान देती है। एक अच्छा अभिनेता बनने के लिए अच्छे व्यक्तित्व का होना अनिवार्य है। सच को सही कहने का साहस होना जरूरी है।

(जैसा की उन्होंने निधि झा को बताया)