
परमात्मा में लीन हो जाना ही जीव का स्वधर्म है। इस स्थिति को प्राप्त करने की चेष्टा ही स्वधर्म पालन है। इसके अभाव में जो इन्द्रियासक्त होकर पशु के समान जीवनयापन करता है, इसी को परधर्म कहते हैं। आत्मा का भी एक स्वाभाविक धर्म है, जो आत्मा में ही रहता है। शुद्ध ब्रह्म निर्गुण है, किन्तु माया से गुणधर्म होते हैं। सगुण ब्रह्म भी शुद्ध-स्वभाव में तथा नि:स्पृह रहता है, किन्तु कुछ न करने पर भी सब उसकी ‘अनिच्छा की इच्छा’ से होता है। यह अनिच्छा की इच्छा ही आत्मा का स्वधर्म है। यही ब्रह्म की निजशक्ति माया है। ब्रह्म जब स्वयं को विश्व रूप में प्रकट करता है तब उसका प्रथम स्पन्दन ही प्राण है। प्राणरूप में ही वह सब भूतों में प्रकाशित होता है।
स्थिर प्राण ईश्वर तथा चंचल प्राण जीव होता है। ये स्थिरता/चंचलता दोनों प्राण के स्वधर्म हैं। प्राण सदा जीव के श्वास-प्रश्वास में प्रवाहित रहता है। प्राण का बहिर्मुखी होना ही मन की चंचलता का कारण है। चंचल प्राण से मन पैदा होता है। (श्री लाहिडी)। श्वास की गति अभ्यासवश ठीक हो जाती है। इस साधना में यदि मन ठीक न बैठे तो उसे मत छोड़ो, क्योंकि अभ्यास करते-करते उसका वैगुण्य भाव मिट जाएगा। समय के साथ आसक्ति ठहर जाएगी।
Updated on:
02 Dec 2022 09:46 pm
Published on:
02 Dec 2022 06:55 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
