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विश्व नागरिकता की उम्मीदें झुठलाती शरणार्थी समस्या

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद ने हाल की भारत यात्रा में संकेतों में कहा कि भारत एक विशाल देश है इसलिए रोहिंग्या समस्या के समाधान के लिए उनके देश की बड़ी मदद कर सकता है। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि भारत रोहिंग्या को म्यांमार भेजने के हर सुरक्षित और त्वरित उपाय का समर्थन करता है। यहां एक बात ध्यान देने की है कि 1951 के शरणार्थी सम्मेलन और 1967 के प्रोटोकॉल का न तो भारत हस्ताक्षरी है और न ही बांग्लादेश।

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जयपुर

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Patrika Desk

Sep 12, 2022

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म्यांमार से लेकर यूक्रेन तक शरणार्थियों की दयनीय दशा को देखकर लगता है कि विश्व ग्राम की कल्पना महज साइबर दुनिया तक ही सीमित रहने वाली है। हालांकि रोहिंग्या शरणार्थियों और यूक्रेन शरणार्थियों की दशा में बहुत अंतर है और दोनों समस्याओं की उत्पत्ति भी अलग है, पर कई समानताएं भी हैं। शरणार्थी समस्या वास्तव में युद्ध, दमनकारी सत्ता के अत्याचार, आर्थिक तबाही, प्राकृतिक आपदा, जातीय, धार्मिक और राष्ट्रवादी विचारों के उग्र स्वरूप से पैदा होती है। उन्हें हल करने के लिए विश्व नागरिकता, उदारता, बहुलता और मनुष्य मात्र की एकता की धारणा में विश्वास जरूरी है। यानी अगर राष्ट्रवादी सरकारों का मन बड़ा हो और बहुसंख्यक समुदाय का हृदय विशाल हो तो शरणार्थी समस्या कांटों की बजाय फूल जैसी लगेगी।
यही वजह है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद ने हाल की भारत यात्रा में संकेतों में कहा कि भारत एक विशाल देश है इसलिए रोहिंग्या समस्या के समाधान के लिए उनके देश की बड़ी मदद कर सकता है। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था कि भारत रोहिंग्या को म्यांमार भेजने के हर सुरक्षित और त्वरित उपाय का समर्थन करता है। यहां एक बात ध्यान देने की है कि 1951 के शरणार्थी सम्मेलन और 1967 के प्रोटोकॉल का न तो भारत हस्ताक्षरी है और न ही बांग्लादेश।