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Pravah Bhuwanesh Jain column: राजस्थान में फिजियोथेरेपिस्टों की दुर्दशा पर केंद्रित 'पत्रिका' समूह के डिप्टी एडिटर भुवनेश जैन का यह विशेष कॉलम- प्रवाह

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Pravah Bhuwanesh Jain column: एक लोकप्रिय गीत है- 'चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए। सावन जो अगन लगाए, उसे कौन बुझाए।' लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में इस पंक्ति को यों कहा जाएगा कि जब कहीं अन्याय होगा तो सरकार न्याय करेगी। लेकिन सरकार खुद अन्याय करने लग जाए तो...। ऐसा ही अन्याय आज राजस्थान के हजारों फिजियोथेरेपिस्टों के साथ हो रहा है। अपने यौवनकाल का बहुमूल्य समय और लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद आज हजारों फिजियोथेरेपिस्ट दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।


राज्य के बेरोजगारों के लिए भी सरकार ने चार हजार रुपए का भत्ता निर्धारित कर रखा है। पर डिग्रीधारी फिजियोथेरेपिस्टों का सरकार खुद ही शोषण करने में लगी है। न इनके वेतन की कोई नीति बनाई गई है, न ही कैडर का पुनर्गठन किया गया है। प्रदेश में अभी तक फिजियोथेरेपिस्ट काउंसिल तक नहीं है।

इसलिए न कोई नियम है और न कार्यप्रणाली। जिसका जितना मन चाहा, वेतन दे दिया। कई जगह तो वेतन के नाम पर 500 से 2 हजार रुपए तक पकड़ा दिए जाते हैं। आज सरकारें हर बात वोटों के तराजू पर तौलती हैं। जिस वर्ग की संख्या ज्यादा है, वह सरकारों का प्रिय बन जाता है। छोटे वर्ग की आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है।

ऐसा ही फिजियोथेरेपिस्टों के छोटे से वर्ग के साथ हो रहा है। चार वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद फिजियोथेरेपी के छात्र-छात्राओं को इंटर्नशिप करनी पड़ती है। सवाई मानसिंह अस्पताल जैसा संस्थान इंटर्नशिप में मानदेय देने के बजाय इन छात्रों से फीस के रूप में 25 हजार रुपए झाड़ लेता है। मानदेय के नाम पर उनके साथ धोखाधड़ी के मामले भी सामने आ रहे हैं। जब सरकार ही शोषण कर रही है तो कुछ निजी अस्पताल और चिकित्सक तो एक कदम आगे ही निकलते हैं।

चिकित्सक, नर्सिंगकर्मी व अन्य पदों के लिए काउंसिल है। लेकिन फिजियोथेरेपिस्टों के लिए सरकार ने काउंसिल ही नहीं बनाई। शोषण या अन्याय की शिकायतें करें भी तो कहां करें। बिना काउंसिल गैर-डिग्रीधारी भी बड़ी संख्या में पनप रहे हैं। कहने को तो राजस्थान में बेराजगारों के लिए हजारों पदों के सृजन के दावे किए जा रहे हैं, पर जब काउंसिल ही नहीं है तो फिजियोथेरेपिस्ट के लिए नियमित भर्ती की व्यवस्था कैसे होगी।

मजबूरन युवा फिजियोथेरेपिस्टों को दो-चार हजार रुपए की नौकरी के लिए अस्पतालों और चिकित्सकों के समक्ष गिड़गिड़ाते देखा जा सकता है। कई जगह वादे के बावजूद पूरा भुगतान नहीं होता। राजस्थान में श्रम विभाग और श्रम आयुक्त जैसे विभाग हैं, पर इन्हें भी इस अन्याय की ओर देखने की फुर्सत नहीं।

राजस्थान में सरकारी और निजी क्षेत्र में 42 फिजियोथेरेपी कॉलेज हैं। मां-बाप अपने बच्चों का दाखिला दिलाते वक्त सपने देखते हैं कि उनकी संतान की भी अच्छी नौकरी होगी। वार्षिक वेतनवृद्धि, ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं होंगी, पर उनके सपने तब चूर-चूर हो जाते हैं जब वे अपने बच्चों को दर-दर भटकते देखते हैं। पर वे अपनी फरियाद लेकर कहां जाएं-जब बाड़ ही खेत खाए तो रखवाली करे कौन?

bhuwan.jain@epatrika.com

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