— प्रो. हिमांशु राय ( निदेशक, आइआइएम इंदौर)
आज सबसे प्रभावी लीडर वे नहीं हैं, जो आदेश देते हैं, बल्कि वे हैं जो प्रेरित करते हैं
दशकों से नेतृत्व को नियंत्रण माना जाता रहा है- उपाधियां, शक्ति और अधिकार से पूर्ण। कुछ वर्षों पूर्व पारंपरिक रूप से लीडर शीर्ष पर होते थे, वे निर्णय लेते थे और दूसरों से उसका अनुसरण करने की अपेक्षा करते थे। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया विकसित हो रही है, वैसे-वैसे नेतृत्व की हमारी समझ भी विकसित हो रही है। आज सबसे प्रभावी लीडर वे नहीं हैं,जो आदेश देते हैं, बल्कि वे हैं जो प्रेरित करते हैं। वे पदानुक्रम के माध्यम से शासन नहीं करते हैं, वे प्रभाव और उद्देश्य के माध्यम से नेतृत्व करते हैं। यह बदलाव उन संगठनों में स्पष्ट है, जो कठोर संरचनाओं से दूर सहयोगी विकेंद्रीकृत नेतृत्व की ओर बढ़ रहे हैं। पहले नेतृत्व का अर्थ था- एक व्यक्ति के जरिए विजन को आगे बढ़ाना, अब नेतृत्व एक साझा जिम्मेदारी है। सबसे नवीन कंपनियां और संस्थान इसलिए फलते-फूलते हैं, क्योंकि वे सभी स्तरों पर व्यक्तियों को स्वामित्व लेने, निर्णय लेने और सार्थक रूप से योगदान करने के लिए सशक्त बनाते हैं। यह कोई नई अवधारणा नहीं है।
भारतीय साहित्य ने लंबे समय से सामूहिक नेतृत्व और नैतिक जिम्मेदारी के विचार पर बल दिया है। उदाहरण के लिए, महाभारत को ही लें। युधिष्ठिर, सबसे बड़े पांडव और सही उत्तराधिकारी होने के बावजूद, कभी केवल अधिकार के बल पर शासन नहीं करते थे। उनका नेतृत्व धर्म (नैतिक कर्तव्य), परामर्श और नैतिक निर्णय लेने में निहित था। इसी तरह समकालीन संगठनों में सफल होने वाले लीडर ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से मार्गदर्शन करते हैं, न कि केवल पदीय शक्ति से। सामाजिक आंदोलनों, स्टार्टअप और डिजिटल समुदायों का उदय दर्शाता है कि नेतृत्व अब उपाधियों से बंधा नहीं है। सत्ता का कोई आधिकारिक पद नहीं होने पर भी वैश्विक स्तर पर बदलाव को प्रेरित कर सकते हैं। यह परिवर्तनकारी नेतृत्व ही तो है।
परिवर्तनकारी नेतृत्व की शैली अपनाने वाले लीडर केवल प्रबंधन नहीं करते हैं, वे अपने मिशन और सामूहिक पहचान की भावना उत्पन्न कर अनुयायियों को प्रेरित करते हैं। नेतृत्व का वास्तविक माप दीर्घकालिक प्रभाव है। नेतृत्व अब केवल शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के बारे में नहीं है। सफलतम लीडर दूसरों को नेतृत्व करने के लिए प्रेरित करते हैं और उस बदलाव में ही नेतृत्व का भविष्य भी लिखते हैं।