
Nepal Politics (ANI)
भारत के पड़ोसी नेपाल में फिर बड़े उथल-पुथल के आसार नजर आ रहे हैं। लोकशाही और राजशाही के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। राजशाही समर्थकों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प के लिए लोकतंत्र समर्थक पार्टियां पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। मार्च की शुरुआत में काठमांडू के त्रिभुवन एयरपोर्ट पर पूर्व नरेश के स्वागत में भारी भीड़ उमडऩे और राजशाही की वापसी के नारे लगने से संकेत मिलने लगे थे कि नेपाल में लोकतंत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी होने वाली हैं। दरअसल, आजादी के बाद भारत में जिस तरह लोकतंत्र की जड़ें निरंतर मजबूत और गहरी होती गईं, हमारे पड़ोसी देशों नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में वैसा नहीं हो पाया। राजनीतिक अस्थिरता के कारण इन देशों में लोकतंत्र पर बार-बार संकट छाता रहा। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का आलम यह है कि राजशाही के खात्मे के बाद 17 साल में वहां कोई प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। नेपाल की लोकतंत्र समर्थक पार्टियों की राजनीतिक अवसरवादिता और वैचारिक भटकाव के कारण देश की जनता का वह सपना अब तक साकार नहीं हो पाया, जो उसने 2008 में राजशाही की विदाई के समय देखा था।
आर्थिक संकट समेत कई समस्याओं से जूझ रही जनता को लग रहा है कि जब लोकशाही में उसके हितों की अनदेखी हो रही हो तो राजशाही क्या बुरी थी। राजशाही के समर्थन में प्रदर्शन आकस्मिक या स्वत: स्फूर्त नहीं हैं। काफी समय से पूर्व नरेश नेपाल के दूर-दराज के इलाकों का दौरा कर राजशाही की वापसी के लिए संभावनाएं टटोल रहे थे। गौर करने वाली बात यह है कि जिन देशों में लोकतंत्र फला-फूला है, वहां लोक-हित को राजनीतिक पार्टियों ने सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी। अलग-अलग विचारधारा के बावजूद उन्होंने खुद को जनता की आशाओं और आकांक्षाओं से नहीं कटने दिया। यानी लोकतंत्र को मजबूती देना राजनीतिक पार्टियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। जनता को केंद्र में रखकर पार्टियां शुचिता, सादगी और पारदर्शिता पर जितना जोर देती हैं, लोकतंत्र उतना मजबूत होता है। दुर्भाग्य से नेपाल की राजनीतिक पार्टियां इस कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। अगर वहां राजशाही की बहाली की मांग उठ रही है तो इसके लिए काफी हद तक पार्टियां भी जिम्मेदार हैं।
नेपाल में हिंसा के बाद पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल प्रचंड ने भी कहा है कि जब लोकतंत्र समर्थक पार्टियां लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम हो जाती हैं तो राजशाही समर्थक सिर उठाने की कोशिश करते हैं। प्रचंड संसद में आरोप लगा चुके हैं कि मौजूदा के.पी. शर्मा ओली सरकार की अव्यवस्थाओं से परेशान लोग पूर्व नरेश की ओर देख रहे हैं। दूसरी तरफ ओली पूर्व नरेश को चुनौती दे चुके हैं कि अगर वे सत्ता में लौटने के इच्छुक हैं तो अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ लें। फिलहाल वक्त का तकाजा है कि आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से बचकर नेपाल की सभी पार्टियां देश में लोकतांत्रिक चेतना विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करें।
Updated on:
05 Jul 2025 05:52 pm
Published on:
30 Mar 2025 09:27 pm
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