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उल्लास का प्रदर्शन न बने हादसे का कारण

यह भी चिंता करनी होगी कि कोई चिंगारी किसी को बर्बाद न करे।

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Feb 09, 2024

उल्लास का प्रदर्शन न बने हादसे का कारण

उल्लास का प्रदर्शन न बने हादसे का कारण

- सुधीर मोता
समसामयिक विषयों के टिप्पणीकार

मध्य प्रदेश के हरदा में पटाखे बनाने वाले कारखाने में हुई भीषण दुर्घटना सचमुच विचलित करनी वाली है। कानून-कायदों को ताक में रखकर संचालित होने वाली ऐसी फैक्ट्रियों के दर्जनों उदाहरण होंगे जो जानलेवा हादसों का कारण बने हैं। ऐसे हादसों के कारण यह कारोबार तो सवालों के कटघरे में है ही, बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर हम कब तक गोला-बारूद के जरिए अपने उल्लास का प्रदर्शन करते रहेंगे? हर मोड़ पर युद्ध के आसन्न संकट से रूबरू होती दुनिया ने अपनी खुशी के इजहार का यह माध्यम कब ढूंढ लिया यह कहा नहीं जा सकता। दुनिया के चार महान आविष्कारों का श्रेय चीन को दिया जाता है। ये हैं - दिशासूचक कम्पास, गन पाउडर, कागज और मुद्रण या प्रिटिंग। इसमें कोई संदेह नहीं कि इनमें से तीन ने दुनिया को दिशा बताने से ले कर दिशा देने तक के कामों में महान भूमिका निभाई है । लेकिन गन पाउडर की भूमिका अलग रही। दसवीं सदी में हुई इस खोज के बाद आज निरंतर शोध करते करते हम एटम बम बनाने तक आ पहुंचे । वर्ष 1605 में इंग्लैंड के हाउस ऑफ लार्डस को उड़ाने की साजिश विफल हो गई लेकिन इसे आज भी ‘गन पाउडर प्लॉट’ के नाम से जाना जाता है।

युद्ध और प्रेम के दो ध्रुवों के बीच दुनिया का कारोबार सदियों से चल रहा है। प्रेम जैसी अनंत शक्ति की अभिव्यक्ति जितनी कोमल और प्रच्छन्न होती है, उतनी ही कारगर और आनंददायी होती जाती है। इसके तरीके भी चाहे कितने ही आधुनिक होते जाएं, इनके मूल में वही कोमलता है। युद्ध हमारी मानसिकता का ऐसा तंतु है जो अधिक से अधिक घातक और नुकीला होता जा रहा। बारूद के आविष्कार ने तो टकरावों की पराकाष्ठा का मार्ग दे दिया। कभी परिवार में बच्चे के जन्म पर थाली बजाने का रिवाज था। उससे आस पड़ोस वाले तो जान ही जाते थे उल्लास की मुखर अभिव्यक्ति भी हो जाती थी।

आज हम बारूदी युग में हैं। हमारे उल्लास की अभिव्यक्ति भी इस युग के अनुरूप होने लगी है। किसी खेल में देश की विजय पर भी उल्लास की अभिव्यक्ति किसी त्योहार से कम नहीं होती। विकसित देशों में भी अनेक अवसरों पर आतिशबाजी के जरिए उल्लास की अभिव्यक्ति का चलन है। हरदा जैसा हादसा होता है तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर उल्लास का यह प्रदर्शन आतिशबाजी से ही क्यों? कुछ तो नियंत्रण करना ही होगा ताकि ऐसे ‘मौत के कारखाने’ पनप नहीं सकें। हम सोच कर खरीदेंगे तो ये विस्फोटक बनेंगे भी कम। जैसे हम सारी दुनिया को अपने उत्साह में शामिल करना चाहते हैं, वैसे ही हमें यह भी चिंता करनी होगी कि कोई चिंगारी किसी का घर-परिवार को बर्बाद नहीं कर दे।