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कागजों से बाहर लाएं जंगल की आग बुझाने की तैयारियों को

चिंता की बात यह है कि तमाम दावों के बावजूद दावानल पर काबू करने के वन विभाग के प्रयास नाकाफी नजर आते हैं- अभिषेक श्रीवास्तव

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जंगल की आग एक बार लग जाए तो फैलते देर नहीं लगती। खासतौर से गर्मियों की शुरुआत में दावानल की घटनाएं ज्यादा होती हैं। अपनी प्राकृतिक संपदा के लिए ख्यात मेवाड़ के जंगल गर्मी की शुरुआत के साथ पिछले दिनों अलग-अलग स्थानों पर कई बार सुलग चुके हैं। कई क्षेत्रों में तो आग की लपटें दूर तक देखी गईं। जंगल की आग का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इससे वन्यजीवों के साथ ही वन औषधि को भारी नुकसान पहुंचने का अंदेशा रहता है। इसलिए समय रहते इस पर काबू पाना जरूरी हो जाता है। चिंता की बात यह है कि तमाम दावों के बावजूद दावानल पर नियंत्रण के वन विभाग के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि सज्जनगढ़, जयसमंद, केवड़ा की नाल समेत आधा दर्जन पहाडिय़ां रह-रह कर दावानल की चपेट में आ रहीं हैं। यह खतरा आगे भी बना हुआ है। उदयपुर में तो पिछले दिनों लगी आग से आबादी पर भी संकट मंडराने लगा था। कुछ घरों को एहतियातन खाली कराना पड़ा था। पिछले तीन महीनों में अकेले उदयपुर मंडल में 56, उदयपुर उत्तर में 93 और वाइल्ड लाइफ में 20 स्थानों पर दावानल की घटनाएं सामने आईं।

दावानल की रोकथाम यों भी काफी मुश्किल भरा काम होता है। लेकिन भविष्य के खतरों को कम करने की दिशा में जंंगलात महकमे की तैयारियों की तह में जाएं तो सारी कवायद कागजों में नजर आती है। पिछले कुछ सालों में जितनी बातें अधिकारियों ने दावानल को लेकर की, उससे काफी कम काम जमीनी स्तर पर हुआ है। मेवाड़ के समृद्ध जंगलों में अभी तक फायर लाइन का काम भी पूरा नहीं हो सका है। जहां फायर लाइन हैं, वे भी काम नहीं कर रही हैं। सेटेलाइट इमेज से आग की लोकेशन मिलने का दावा करने वाले वन विभाग के पास संसाधन के नाम पत्ते और झाडिय़ां ही हैं। विभाग के कर्मचारी इन्हीं के सहारे मगरियों पर आग बुझाते दिख जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रास्ता नहीं होने से दमकलकर्मी भी वहां नहीं पहुंच पाते। नतीजतन जबतक आग पर काबू पाया जाता है, तबतक काफी नुकसान हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि वन विभाग कागजी दावों से बाहर निकल दावानल पर नियंत्रण के लिए प्रभावी इंतजाम करे। जिन क्षेत्रों में फायर लाइन नहीं बिछी है, वहां इस पर शीघ्र कार्य होना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि पिछले वर्षों में जंगल की आग को नियंत्रित करने के लिए हुई कवायद के विषय में वन विभाग से जानकारी ले। साथ ही इस पर गंभीरता दिखाते हुए प्रभावी कदम उठाए। जंगल में आए दिन लगने वाली आग की घटनाएं मेवाड़ में ही होती हों ऐसा नहीं है। जहां भी आग बुझाने के उपाय नाकाफी हों, वहां ऐसे ही हालात सामने आते हैं। जंगलों को आग की घटनाओं से महफूज रखना होगा।

abhishek.srivastava@in.patrika.com