भीलवाड़ा। आइपीएल के प्रति जोश एवं उत्साह चरम पर है। मैच के दौरान खेल प्रेमियों की नजरें टीवी स्क्रीन पर या फिर मोबाइल पर ही टिकी रहती है। सभी की निगाहें यही जानने की कोशिश करती है कि मैच का स्कोर क्या चल रहा है। इसी आइपीएल में अंतरराष्ट्रीय स्कोरर एवं भीलवाड़ा के सुभाषनगर निवासी दीपक शर्मा भी स्कोरिंग कर रहे है। उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश निम्न है।
पत्रिका: स्कोरिंग में केरियर की शुरुआत कैसे की ?
दीपक: वर्ष 1995 में पहली बार स्कोरिंग की, मुझे आगे बढ़ाने में आरसीए के पूर्व संयुक्त सचिव स्वर्गीय राकेश अग्रवाल एवं आरसीए के पूर्व संयुक्त सचिव व मौजूदा डीसीए अध्यक्ष महेन्द्र नाहर का अहम सहयोग रहा है
पत्रिका: आरसीए के लिए कब से स्कोरिंग शुरू की ?
दीपक: आरसीए की स्कोरिंग और एम्पायरिंग पैनल के लिए एग्जाम होते है। मैंने यह एग्जाम पास किया। मैं, चाहता तो एम्पायरिंग भी कर सकता था लेकिन झुकाव स्कोरिंग पर ही रह
पत्रिका: बीसीसीआई के लिए कैसे चुने गए?
दीपक: वर्ष 2004 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बीसीसीआई ने एग्जाम आयोजित किया, इसमें पास हुआ, इसके बाद बीसीसीआई की स्कोरिंग टीम में शामिल हो गया।
पत्रिका: किस प्रकार की प्रतियोगिता के लिए स्कोरिंग करते है?
दीपक: अभी तक याने वर्ष 2025 तक बीसीसीआई के लिए तीन सौ मैचों के लिए स्कोरिंग कर चुका हूं। इनमें 20 अंतरराष्ट्रीय व सत्तर से अधिक आइपीएल है। शेष घरेलू मैच है। जैसे रणजी ट्रॉफी, ईरानी व दिलीप, सीके नायडू ट्रॉफी मुख्यत: शामिल है।
पत्रिका: स्कोरिंग के स्तर में किस प्रकार का बदलाव आया है
दीपक: स्कोरिंग की प्रक्रिया अब पूरी तरह से ऑनलाइन हो चुकी है। दर्शक के साथ ही ऑनलाइन जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को मैच का तुंरत अपडेट चाहिए।
पत्रिका: ऑनलाइन स्कोरिंग कब से कर रहे है ?
दीपक: वर्ष 2011 से बीसीसीआई के लिए ऑनलाइन स्कोरिंग कर रहा हूं। बीसीसीआई की साइट पर मैच के दौरान स्कोर लगातार अपडेट होते हैं। लाइव प्रसारण में तो सभी की नजर स्कोरिंग पर टिकी रहती है।
पत्रिका: स्कोरिंग करना अब आसान हुआ क्या?
दीपक: स्कोरिंग करना अब आसान नहीं रहा, आप सोचिए एक बॉल की एंट्री करीब 7- 8 जगह होती है। स्टेट्सग्राफ़िक्स बनते है, जैसे बॉल कहां टप्पा खाई, बॉल कहां गई, बल्लेबाज ने उसे कैसे और कहां खेला, टीम पर क्या असर हुआ, किस, जगह से कितने रन बने आदि, कई स्कोरिंग का पार्ट होते है, प्रत्येक बॉल के विश्लेषण के लिए चौकन्ना ही रहना पडता है।