Raisina Dialogue 2025: विदेश मंत्री ने कहा एक मजबूत वैश्विक व्यवस्था में मानकों में कुछ बुनियादी स्थिरता होनी चाहिए। हमारे पूर्व में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुए हैं, ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। हम उन्हें पश्चिम में और भी अधिक नियमित रूप से देखते हैं।
Raisina Dialogue 2025: रायसीना डायलॉग 2025 के दूसरे दिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में दोहरे मानदंडों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने पश्चिमी देशों की नीतियों की विसंगतियों को उजागर करते हुए कहा आज जब हम राजनीतिक हस्तक्षेप की बात करते हैं, तो पश्चिमी देश इसे लोकतंत्र का समर्थन कहते हैं, लेकिन जब हम उनके मामलों पर सवाल उठाते हैं, तो इसे दुर्भावनापूर्ण बताया जाता है। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान को लेकर भी बात कही।
उन्होंने कहा कि आज वैश्विक व्यवस्था की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हमें एक मजबूत और न्यायसंगत संयुक्त राष्ट्र की जरूरत है। एक मजबूत वैश्विक व्यवस्था में मानकों में कुछ बुनियादी स्थिरता होनी चाहिए। हमारे पूर्व में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुए हैं, ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। हम उन्हें पश्चिम में और भी अधिक नियमित रूप से देखते हैं।
विदेश मंत्री ने कहा पिछले आठ दशकों के दुनिया के कामकाज का ऑडिट करना, इसके बारे में ईमानदार होना और यह समझना आज महत्त्वपूर्ण है कि दुनिया में संतुलन और शक्ति का वितरण बदल गया है। अब हमें एक नई वैश्विक व्यवस्था की जरूरत है।' जयशंकर ने वैश्विक नीति निर्माण में निष्पक्षता और स्थिरता की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। सम्मेलन में 125 देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। जयशंकर की पाकिस्तान को दो टूक (यह वीडियो पुराना है)...
‘सिंहासन और कांटे: राष्ट्रों की अखंडता की रक्षा’ सत्र में जयशंकर ने कहा हम सभी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की बात करते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, किसी अन्य देश द्वारा किसी क्षेत्र पर सबसे लंबे समय तक अवैध कब्जे का उदाहरण भारत के कश्मीर से जुड़ा है। हमने संयुक्त राष्ट्र का रुख किया पर आक्रमण को विवाद बना दिया गया। हमलावर और पीड़ित को बराबर रखा गया।
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि एक प्रभावी वैश्विक व्यवस्था दुनिया के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी किसी देश के लिए घरेलू शासन व्यवस्था। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यवस्था नहीं होगी, तो सिर्फ बड़े देशों को ही लाभ नहीं मिलेगा, बल्कि वे देश भी जिनका चरमपंथी रुख है, अव्यवस्था को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेंगे।' उन्होंने पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा कि जोखिम भरा देश होने के लिए बड़ा होना जरूरी नहीं, कुछ छोटे देश भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं।
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने अपने संबोधन में भारत की समृद्ध संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ‘अलोहा’ और ‘नमस्ते’ केवल अभिवादन के शब्द नहीं, बल्कि सम्मान और एकता के प्रतीक हैं। जब हम एक-दूसरे को इन शब्दों से संबोधित करते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम आपसी सम्मान और समानता को स्वीकार कर रहे हैं। यह विभाजन और पक्षपात से परे एक गहरे संबंध का प्रतीक है। गबार्ड ने आगे कहा ये शब्द हमारे भीतर मौजूद शाश्वत दिव्य आत्मा की पहचान हैं। हम सभी जुड़े हुए हैं, चाहे हमारी जाति, धर्म, राजनीति, या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। जब हम इस दृष्टिकोण से संवाद करेंगे, तो विभाजन और विषाक्तता खत्म हो जाएगी।
'शांति की लड़ाई: आगे देखने के लिए पीछे देखना' सत्र में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने स्वीकार किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध पर 2022 में उनका रुख गलत था। उन्होंने माना कि भारत की तटस्थता को लेकर उनकी आलोचना उचित नहीं थी और अब उन्हें अपने बयान पर अफसोस है। थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संतुलित विदेश नीति की सराहना की, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत स्थिति में बनाए रखा। उन्होंने कहा कि तब भारत की चुप्पी उन्हें अनुचित लगी थी, लेकिन अब वह महसूस करते हैं कि भारत का संतुलित रुख ही सही था।